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रविवार, 12 जून 2011

"गीत-...छाया नभपर घन होता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

जब-जब भी ऊपर को देखा,
छाया नभपर घन होता है।
बरस रहा सावन होता है,
रोता हुआ चमन होता है।।
कैसे मस्ती-मौज करें सब,
क्या इसमें स्नान करें अब,
बरस रहा है लहू गगन से,
बौना अपनापन होता है।
कहाँ गया वो हँसता आँगन,
कहाँ गया वो खिलता उपवन,
कहाँ खो गया मधुर तराना,
सहमा सा बचपन होता है।
प्यार भरे त्यौहार नहीं है,
स्वार्थ बिना उपहार नहीं हैं,
ईद-दिवाली-होली-क्रिसमस,
में भी मैला मन होता है।
बिकती इज्जत, लुटती अस्मत,
लोकतन्त्र की फूटी किस्मत,
अनशन पर शासन का डण्डा,
सत्याग्रह दमन होता है।
बढ़ा प्रदूषण, फैला शोषण,
देते फल और अन्न कुपोषण,
मानव, धन का बना भिखारी
माटी का कण-कण रोता है।

26 टिप्‍पणियां:

  1. ek nahi do char nahi, lakho wikat samasyayen hain,
    shashan chhup baitha parde ke peeche, dikhti bas chhayayen hain...


    sunder rachna....

    उत्तर देंहटाएं
  2. किसी भी तरह हो, स्थितियाँ सुधरें।

    उत्तर देंहटाएं
  3. कहाँ गया वो हँसता आँगन,
    कहाँ गया वो खिलता उपवन,
    कहाँ खो गया मधुर तराना,
    सहमा सा बचपन होता है।

    वर्तमान परिस्थितियों को दर्शाती विचारणीय रचना... आभार

    उत्तर देंहटाएं
  4. इस समय इतने सारे समस्याओं से हमारा देश घिरा हुआ है जिसका आपने बहुत ही सुन्दरता से वर्णन किया है चित्रों के साथ!

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाकई हालात पर चिंतित हूं हर घटना को मूक देखते जन मानस का आक्रोश जिस दिन फ़ूटेगा लोकतंत्र की चूलें खिसक जायेगी ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (13-6-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  7. आज के हालत पर सटीक रचना ... हर शब्द जैसे गूंज रहा हो //

    उत्तर देंहटाएं
  8. कैसे मस्ती-मौज करें सब,
    क्या इसमें स्नान करें अब,
    बरस रहा है लहू गगन से,
    बौना अपनापन होता है।

    ....आज के हालात का बहुत सटीक चित्रण..बहुत सुन्दर और मर्मस्पर्शी रचना..आभार

    उत्तर देंहटाएं
  9. वर्तमान परिस्थितियों को दर्शाती विचारणीय रचना| धन्यवाद|

    उत्तर देंहटाएं
  10. बिलकुल सामयिक और विचारणीय रचना.

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  11. गम्भीर वैचारिक सोच से उद्भूत एक सुंदर कविता !

    उत्तर देंहटाएं
  12. इस वक़्त कि समस्याओं को बहुत सही रूप देकर उभरा है आपने ....विचार करने योग्य आज के तथ्य

    उत्तर देंहटाएं
  13. बरस रहा है लहू गगन से ,बौना अपना पन होता है ,
    ईद दिवाली होली क्रिसमस ,में भी मैला मन होता है ।
    अनशन पर शाशन का डंडा ,सत्या- ग्रह दमन होता है .
    जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है इन प्रासंगिक अशारों पर .

    उत्तर देंहटाएं
  14. कहाँ गया वो हँसता आँगन,
    कहाँ गया वो खिलता उपवन,
    कहाँ खो गया मधुर तराना,
    सहमा सा बचपन होता है।

    विचारणीय- विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  15. माटी का कण -कण रोता है ....इस देश में आम जन भी रोता ही है ...
    आमजन की पीड़ा को स्वर दिए आपने ...
    आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  16. ....माटी का कण -कण रोता है ......./
    हमें यही कहना है ,
    [कोई मसीहा आये इस वतन को बचाए --खुदा मान लेंगे ]
    भाव- प्रवर रचना .शुक्रिया जी /

    उत्तर देंहटाएं
  17. हकीक़त बयान करती उत्कृष्टतम रचना... ढेरों बधाईयाँ सर!

    उत्तर देंहटाएं
  18. अच्छी रचना , भाव पूर्ण व उद्देश्य निहित....
    ---हाँ कलापक्ष के अनुसार ....तथ्य.भ्रंश ...
    जब-जब भी ऊपर को देखा,
    छाया नभपर घन होता है।

    ----क्या ये सार्वकालिक स्थिति है....वर्षा.मेघ के चित्र की स्थिति सहित..नहीं ..

    उत्तर देंहटाएं

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