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शनिवार, 4 जून 2011

"शाखाओं पर लदे पड़े हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


आज पढ़िए!
मौसम के अनुकूल रचना!

IMG_1296पकने को तैयार खड़े हैं!
शाखाओं पर लदे पड़े हैं!!
IMG_1295झूमर बनकर लटक रहे हैं!
झूम-झूम कर मटक रहे हैं!! 

कोई दशहरी कोई लँगड़ा!
फजरी कितना मोटा तगड़ा!!
IMG_1300बम्बइया की शान निराली!
तोतापरी बहुत मतवाली!!

 कुछ गुलाब की खुशबू वाले!
आम रसीले भोले-भाले!!

20 टिप्‍पणियां:

  1. लटके हुए आम के चित्र देख कर बस लपक कर इसे तोड़ने का मन कर गया।
    आपने इतना सरस “आम” बनाया है कि बस मुंह में पानी आ गया, पर हमारे यहां के “खास” को जगह नहीं दी अपने बगीचे में तो मैं ही दो पंक्तियों में इन्हें लगा देता हूं।
    हिम सागर की है सबसे बात निराली
    जल्दी से पा लो, है खत्म होने वाली।

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  2. आम का मौसम,घर में बैठे-बैठे आम के बगीचे की सैर करा दी.तोतापरी का सौंदर्य तो सबसे हट कर है.बहुत ही रसीली बाल-कविता.बड़े भी कैसे बच सकते हैं ? मुंह में पानी तो सभी के आएगा.

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  3. कमाल कर दिया आपने तो आज शाखाओं पर लटका दिया और मूँह मे पानी ला दिया।

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  4. " आम देख में मन में लालच आया
    मन ही मन में इसे तोड़ खाया "

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  5. वाह जी आम तो अपनी जान है
    शुरु से.. तोतापुरी,सफेदा,सिंदूरी,केसर,नीलम,दशहरी,चौसा,लंगड़ा,रस्गुला,देसी टपका,फजली
    ६० किलोग्राम आम खाने का टारगेट है इस बार बहुत अच्छी बहार है अबकी बार बस १० दिन मौसम और साथ दे
    यम यम यम

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  6. हम भी रोज खा रहे है, पर आप तो एकदम ताजे पर हाथ साफ़ कर रहे हो,

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  7. लालच लगवा दी इस रचना और तस्वीरों ने...

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  8. क्या यह आम , आमआदमी के लिए है ? हमने तो देख कर ही आनंद ले लिया .....

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  9. क्या सजीले आम हैं ... बहुत सुन्दर कविता और चित्र भी

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  10. we are also mango people--------------------bole to aam aadmi

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  11. फलो के राजा ...आम की जय हो ...बहुत बढ़िया

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  12. जैसा रोशनी जी ने कहा की कविता पड़ते ही मुह में पानी आ गया!आखिर कविता में भी तो फलो के राजा आम है!धन्यवाद जो आपने इतनी अच्छी कविता हम तक पहुचाई !आप लोग मेरे ब्लॉग पर भी आये!आने के लिए ये रही लिंक-"samrat bundelkhand"

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  13. सुन्दर मनभावन रचना.

    मौसमी ....

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  14. ्बहुत सुन्दर गीत और उतना ही सुन्दर आमों का मनमोहन रूप।

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  15. वाह! मीठे रसीले आम देखकर तो मुँह में पानी आ गया! आम तो मेरा सबसे पसंदीदार फल है! ख़ूबसूरत प्रस्तुती!

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