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मंगलवार, 28 जून 2011

"फिर से बहार आ गई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


उनके आने से फिर से बहार आ गई
मानो पर्वत से चलकर बयार आ गई

बदलियाँ जो गगन पर थी छाई हुईं
जब वो बरसीं तो शीतल फुहार आ गईं

सूखी धरती से सारी दरारें मिटीं
पेड़ पर कोपलों की कतार आ गई

तन चहकने लगा, मन महकने लगा
ख़ुद ख़ज़ाने से चलकर पगार आ गई

रूप गंगा का फिर से सँवरने लगा
उसके सूने से जीवन में धार आ गई

24 टिप्‍पणियां:

  1. बहार यूँ चल कर आयी जैसे खजाने से पगार खुद चली आयी ...
    वाह ...बेहतरीन !

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  2. khubsurat gzal ko pdh kr hmari zindgi me bhi bahaar aa gyi bhtrin gzal ke liyeh shukriya jnaab ...akhtar khan akela kota rajsthan

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर भावाव्यक्ति ,सच्चाई के दर्शन कराती हुई रचना , बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  4. वेतन भोगी को सदा, प्यारी बड़ी पगार |

    कुछ रुपये गर कम हुए, पड़ती घर में झाड़ ||

    पड़ती घर में झाड़, बड़ा नाजुक है मसला |

    होती कुछ बकवाद, हाथ से *मैटर फिसला ||

    दस दिन में सब खर्च, करे वो इसकी सौतन |

    मुहँ खोले फिर ठाढ़ , मांगती फिर से वेतन ||
    *बहु-आयामी है यह मामला



    बहुत सुन्दर प्रस्तुति | बधाई |

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  5. बारिश की फुहारें और गंगप्रवाह।

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  6. wah barish ki phuhar aur ganga ki dhaaar.bahut hi pyaari rachanaa.badhaai sweekaren.

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  7. आसमान से गिरा जल गंगा मे समाहित हो गया

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  8. बारिश की हल्की हल्की फुहार की अनुभूति ...बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं
  9. गंगा और बारिश का खूब संगम किया है।

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  10. बहुत सुन्दर रचना है सर! बिल्कुल ऋतुमती...बधाई

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  11. आपकी रचना यहां भ्रमण पर है आप भी घूमते हुए आइये स्‍वागत है
    http://tetalaa.blogspot.com/

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  12. रूप” गंगा का फिर से सँवरने गया
    उसके सूने से जीवन में धार आ गई
    bahut khoob Shastri ji aate hi aapki itni sunder rachna padhne ko mili.bahut bahut pasand aai.

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  13. सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना!

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  14. तन चहकने लगा, मन महकने लगा
    ख़ुद ख़ज़ाने से चलकर पगार आ गई
    ab pata chala ki fir se bahar kaise aa gayee.bahut sundar bhavabhivyakti.badhai shastri ji.

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  15. बहुत सुन्दर प्रस्तुति | बधाई

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  16. "soone jeevan m bahaar aa gayi..."
    barakha bahaar aa gayi dr. saheb samay ke anusar likha aanad aayaa sadhuwad swikaren

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  17. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  18. सूखी धरती से सारी दरारें मिटीं
    पेड़ पर कोपलों की कतार आ गई

    हमेशा की तरह बहुत खूबसूरत...

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  19. बरसात के मौसम में तन और मन दोनों आल्हादित हो जाते हैं...इसीलिए मौसमी रचनायें फूट रहीं हैं...

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  20. “रूप” गंगा का फिर से सँवरने लगा
    उसके सूने से जीवन में धार आ गई

    काश! गंगा का 'रूप' संवर जाये
    आपके वचन सत्य हों,जो मन को बहुत भाये.

    उत्तर देंहटाएं

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