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शनिवार, 25 जून 2011

"ग़ज़ल" कठिन गुजारा लगता है (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


सुखद बिछौना सबको प्यारा लगता है
यह तो दुनिया भर से न्यारा लगता है

जब पूनम का चाँद झाँकता है नभ से
उपवन का कोना उजियारा लगता है

सुमनों की मुस्कान भुला देती दुखड़े
खिलता गुलशन बहुत दुलारा लगता है

जब मन पर विपदाओं की बदली छाती
तब सारा जग ही दुखियारा लगता है

देश चलाने वाले हाट नहीं जाते
उनको तो मझधार किनारा लगता है

बातों से जनता का पेट नहीं भरता
सुनने में ही प्यारा नारा लगता है

दूर-दूर से रूप पर्वतों का भाता
बाशिन्दों को कठिन गुजारा लगता है

23 टिप्‍पणियां:

  1. सही कह रहे शास्त्री जी |

    दुर्गमता तो पर्वतों पर

    जीवन्त रहती है हमेशा |

    बहुत अच्छी पंक्तियाँ --

    उत्तर देंहटाएं
  2. देश चलाने वाले हाट नहीं जाते
    उनको तो मझधार किनारा लगता है

    बातों से जनता का पेट नहीं भरता
    सुनने में ही प्यारा नारा लगता है
    आज तो जनता के दुख को उजागर कर दिया………बहुत संवेदनशील रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बातों से जनता का पेट नहीं भरता
    सुनने में ही प्यारा नारा लगता है


    bilkul sahee kaha.....so called policy makers seekhen isse....

    उत्तर देंहटाएं
  4. सादर प्रणाम.
    बहुत सुंदर बातों की लड़ी सजाई आपने.
    बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्दर, उम्दा ग़ज़ल सर....
    सादर....

    उत्तर देंहटाएं
  6. बातों से जनता का पेट नहीं भरता
    सुनने में ही प्यारा नारा लगता
    bahut sahi kaha hai aapne .

    उत्तर देंहटाएं
  7. दूर-दूर से “रूप” पर्वतों का भाता
    बाशिन्दों को कठिन गुजारा लगता है
    bahut achcha likhe hain.

    उत्तर देंहटाएं
  8. पहाड़ का कठिनाई भरा जीवन आपकी नज़र के सामने है । इसीलिए आपने उसका ख़ाका ठीक ठीक खींच दिया है । जिन दिनों मैं देहरादून में पढ़ रहा था , उन दिनों और फिर कश्मीरी क़स्बों में बिताए समय में हम उस सच से रू ब रू हुए , जिनका संकेत आपने अंत में किया है ।
    रचना अच्छी लगी ।

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  9. बहुत सुंदर भावों से सजी रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  10. जब तक टी वी का प्रभाव नहीं था...हम अपने आभावों में भी खुश थे...अब लगता है...कितनी दुश्वारियां हैं...जब सारी दुनिया को हम देख रहे हैं...पर सारी दुनिया में...एक से दर्द हैं सब एक से ही रिश्ते हैं...पहाड़ों का सरल जीवन हर किसी के नसीब में नहीं होता...

    उत्तर देंहटाएं
  11. बातों से जनता का पेट नहीं भरता
    सुनने में ही प्यारा नारा लगता है
    bilkul sahi kaha
    sunder gazal

    उत्तर देंहटाएं
  12. देश चलाने वाले हाट नहीं जाते
    उनको तो मझधार किनारा लगता है

    बातों से जनता का पेट नहीं भरता
    सुनने में ही प्यारा नारा लगता है


    बहुत सटीक बात कही है गज़ल में ..बहुत अच्छी प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  13. देश चलाने वाले हाट नहीं जाते
    उनको तो मझधार किनारा लगता है

    bahut sunder mayank daa

    उत्तर देंहटाएं
  14. क्या बात है,मुकम्मल ग़ज़ल पढ़ने को मिली.

    उत्तर देंहटाएं
  15. जब मन पर विपदाओं की बदली छाती
    तब सारा जग ही दुखियारा लगता है...
    सटीक कहा है आपने! सुन्दर ग़ज़ल!

    उत्तर देंहटाएं
  16. bahut sunder gazal likha hai aapne...........aisi panktiyaan hai jisse ki har koi sahmat ho.........vastaw me sahaj tarike se baatein kahi gyi hain inme........acha laga padh k........

    उत्तर देंहटाएं
  17. बैटन से नहीं भरता पेट ...ये नीतियाँ बनाने वाले और सुधारकों को समझ नहीं आता !
    सुन्दर विचार !

    उत्तर देंहटाएं

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