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सोमवार, 4 जुलाई 2011

"कोमल मन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

 
सुख में मुस्काता-दुख में आहत होकर रोता है
पत्थर के तन में भी कोमल-कोमल मन होता है

मन के उपवन में सजती है अरमानों की डोली
केशर की क्यारी में फिर क्यों काँटों को बोता है

लुढ़क-लुढ़क कर पर्वत से जो आया मैदानों में
सरिता की निर्मल धारा में वो ही तन धोता है

श्रम करके कठोर शय्या पर निद्रा सुख से आती
नर्म सेज पर धनिक चैन की नींद नहीं सोता है

विपदाओं की ज्वाला में तपकर ही स्वर्ण चमकता है
खोट आग में जलकर अपनी चमक-दमक खोता है

रूप और लावण्य लुभाता उसका ही दुनिया को
जो मानव मानव बनकर मानवता को ढोता है

33 टिप्‍पणियां:

  1. पत्थर के तन में भी कोमल-कोमल मन होता

    केशर की क्यारी में फिर क्यों काँटों को बोता

    बहुत-बहुत बधाई शास्त्री जी ||
    सुन्दर -रचना ||

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुख में मुस्काता-दुख में आहत होकर रोता है
    पत्थर के तन में भी कोमल-कोमल मन होता है

    वाह गज़ब की प्रस्तुति……………बहुत सुन्दर संदेश दे रही है…………शानदार्।

    उत्तर देंहटाएं
  3. विपदाओं की ज्वाला में तपकर ही स्वर्ण चमकता है
    खोट आग में जलकर अपनी चमक-दमक खोता है

    “रूप” और लावण्य लुभाता उसका ही दुनिया को
    जो मानव मानव बनकर मानवता को ढोता है

    बहुत खूब कहा है ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. “रूप” और लावण्य लुभाता उसका ही दुनिया को
    जो मानव मानव बनकर मानवता को ढोता है
    bahut sundar pangti.......

    उत्तर देंहटाएं
  5. पत्थर के तन में……………………… सुन्दर्।

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी रचना तेताला पर भी है आप भी घूमते हुए आइये स्‍वागत है
    http://tetalaa.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाह .. नमस्कार शास्त्री जी ... आपकी कलम ने तो पत्थर मैं भी जान डाल दी है ...
    बहुत लाजवाब ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. हाय हाय ,
    शास्त्री जी , क्या बात कही है आपने।
    एक आप हैं कि आपको पत्थर के अंदर भी कोमल मन नज़र आ गया है और ज़माने में ऐसे लोग भी हैं कि मोम को भी पत्थर होने का ताना देते हैं।
    देखिए

    आरज़ू ए सहर का पैकर हूँ
    शाम ए ग़म का उदास मंज़र हूँ

    मोम का सा मिज़ाज है मेरा
    मुझ पे इल्ज़ाम है कि पत्थर हूँ

    उत्तर देंहटाएं
  9. श्रम करके कठोर शय्या पर निद्रा सुख से आती
    नर्म सेज पर धनिक चैन की नींद नहीं सोता है
    ye to aapne sach hi kah dala shastri ji.aabhar.

    उत्तर देंहटाएं
  10. श्रम करके कठोर शय्या पर निद्रा सुख से आती
    नर्म सेज पर धनिक चैन की नींद नहीं सोता है

    बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं
  11. मानवता का संदेश देती सार्थक कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  12. श्रम करके कठोर शय्या पर निद्रा सुख से आती
    नर्म सेज पर धनिक चैन की नींद नहीं सोता है


    आप पत्थर में कोमल मन की बात कह रहे हैं और ज़माना लोगों को ही पत्थर मन कह देता है ... सुन्दर प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  13. वाह वाह मानव बन मानवता को ढोना क्या श्ब्द क्या भाव निकल आया है लाजवाब कुछ पंक्तिया कविता पर ही काबिज हो जाती हैं

    उत्तर देंहटाएं
  14. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 05 - 07 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच-- 53 ..चर्चा मंच 566

    उत्तर देंहटाएं
  15. नर्म सेज पर धनिक - सही लिखा है शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  16. विपदाओं की ज्वाला में तपकर ही स्वर्ण चमकता है
    खोट आग में जलकर अपनी चमक-दमक खोता है

    बहुत बढ़िया लगी रचना....

    उत्तर देंहटाएं
  17. पत्थर को भी शब्दों की भाषा में ढाल दिया आपने ...बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं
  18. “रूप” और लावण्य लुभाता उसका ही दुनिया को
    जो मानव मानव बनकर मानवता को ढोता है

    bahut sunder,sarthak ..rachna ...

    उत्तर देंहटाएं
  19. रूप” और लावण्य लुभाता उसका ही दुनिया को
    जो मानव मानव बनकर मानवता को ढोता है...
    मानवता ही मन मोहती है बाकी सब माया !

    उत्तर देंहटाएं
  20. विपदाओं की ज्वाला में तपकर ही स्वर्ण चमकता है
    खोट आग में जलकर अपनी चमक-दमक खोता है
    kya baat hai shastriji.yathart main doobi saarthak rachanaa.bahut khoob.badhaai sweekaren.

    उत्तर देंहटाएं
  21. सुन्दर सन्देश देती हुई ज़बरदस्त रचना! बेहतरीन प्रस्तुती!

    उत्तर देंहटाएं
  22. जो मानव मानव बनकर मानवता को ढोता है....
    बहुत उम्दा शिक्षा, शानदार ग़ज़ल सर,
    सादर...

    उत्तर देंहटाएं
  23. "विपदाओं की ज्वाला में तप कर
    ही स्वर्ण चमकता है "
    बहुत अच्छी अभिव्यक्ति
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  24. अति सुंदर रचना.मानस पटल पर प्रभाव छोड़ने वाली अभिव्यक्ति
    आनन्द विश्वास

    उत्तर देंहटाएं
  25. विपदाओं की ज्वाला में तपकर ही स्वर्ण चमकता है
    खोट आग में जलकर अपनी चमक-दमक खोता है
    सुन्दर प्रस्तुति....साधुवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  26. “रूप” और लावण्य लुभाता उसका ही दुनिया को
    जो मानव मानव बनकर मानवता को ढोता है...
    बहुत ही सुन्दर मानवता के भावों को प्रसारित करने का उद्घोष करती मोहक रचना....!!!

    उत्तर देंहटाएं
  27. स्वतन्त्रता दिवस की शुभ कामनाएँ।

    कल 16/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं

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