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मंगलवार, 26 जुलाई 2011

“अब भी बाकी है........” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

     पिछले कई वर्षों से मैं दो-मंजिले पर रहता हूँ। मेरे कमरे में तीन रोशनदान हैं। उनमें जंगली कबूतर रहने लगे थे। वहीं पर वो अण्डे भी देते थे, परन्तु कानिश पर जगह कम होने के कारण अण्डे नीचे गिर कर फूट जाते थे। मुझे यह अच्छा नही लगता था।

      एक दिन कुछ फर्नीचर बनवाने के लिए बढ़ई लगाया तो मुझे कबूतरों की याद आ गयी। मैंने बढ़ई से उनके लिए दो पेटी बनवा ली और किसी तरह से उनको रोशनदान में रखवा दिया।

      अब कबूतर उसमें बैठने लगे। नया घर पाकर वो बहुत खुश लगते थे। धीरे-धीरे कबूतर-कबूतरी ने पेटी में तिनके जमा करने शुरू कर दिये। थोड़े दिन बाद कबूतरी ने इस नये घर में ही अण्डे दिये। कबूतर और कबूतरी बारी-बारी से बड़े मनोयोग से उन्हें सेने लगे।

      एक दिन पेटी में से चीं-चीं की आवाज सुनाई देने लगी। अण्डों में से बच्चे निकल आये थे। अब कबूतर और कबूतरी उनको चुग्गा खिलाने लगे। धीरे-धीरे बच्चों के पर भी निकलने शुरू हो गये थे। एक दिन मैंने देखा कि कबूतरों के बच्चे उड़ने लगे थे। जैसे ही उनके पूरे पंख विकसित हो गये वे घोंसला छोड़ कर पेटी से उड़ गये ।

jangali kabutar      आज भी यह क्रम नियमित रूप से चल रहा है। कबूतर अण्डे देते हैं। अण्डों में से छोटे-छोटे बच्चे निकलते हैं और पंख आने के बाद उड़ जाते हैं। क्या संसार की यही नियति है? बालक जवान होते ही माता-पिता को ऐसे छोड़ कर चले जाते हैं जैसे कि कभी उनसे कोई नाता ही न रहा हो और माता-पिता देखते रह जाते हैं।

     वे पुनः घोंसले में अण्डे देते हैं। उन्हें इस उम्मीद से सेते हैं कि इनमें से निकलने वाले बच्चे बड़े होकर हमारे बुढ़ापे का सहारा बनेंगे।

      शायद उनके मन में आशा की एक किरण अब भी बाकी है........

21 टिप्‍पणियां:

  1. इतने गंभीर विषय पर आपने कितनी सरलता से सबकी दृष्टि डाली है..!!

    हार्दिक शुभकामनाएँ..!!!

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  2. जीवन सब का अपना होता है उस पर किसी अन्य का हक नहीं है पर जिम्मेदारी बनती है ...

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  3. सुन्दर अभिव्यक्ति ... यही है जीवन ...

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  4. मां बाप तो बस अपना फ़र्ज़ पूरा करते हैं । बच्चों का उड़ना उनकी नियति है । यही सांसारिक धर्म है ।

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  5. यही है ज़िन्दगी का सच्…………वो हमे बताते हैं कि जीवन ऐसे जीना चाहिये मोह के भंवर मे नही फ़ंसना चाहिये मगर हम मानव मोह रूपी दलदल से कभी उबर ही नही पाते और फिर बाद मे पछताते हैं ………बस यही फ़र्क है उनमे और हम मे…………।

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  6. bahut gahre bhaav hain is sansmaran me.yahi duniya ki reet hai.Vandna ji ne sahi likha hai hume in pakshiyon se seekh leni chahiye moh maya me nahi padna chahiye.pankh nikalne par bachchon ko udne me madad karni chahiye.kal ye humari jaroorat ke samay vaapas aayenge upar vaale par chhod dena chahiye.agar aasha hi nahi karenge to nirasha aas pas nahi aayegi.

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  7. शायद यही अंतर है पंछियों और इंसान में ...कि हम ग़तलफ़हमियां पाल लेते हैं {और वे सच्चाई जानते हैं} :)

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  8. अपने सामने किसी जिन्दगी को बढते देखना अच्छा लगता है
    वो कबूतर के बच्चे हो या अपने ...एक जिन्दगी बढती है
    ऐसा ही वाकया मेरे साथ भी हुआ ....एक कबूतर के जोड़े को
    मेरे यहाँ भी पनाह मिली ......अब फिर पूरा परिवार शाम को
    यही आसरा पाता है

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  9. बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  10. कबूतर के प्रति आपकी संवेदना आपके कोमल मन का द्योतक है..

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  11. बहुत ही गहरी बात कही शाश्त्री जी, खग मार्ग यही है.

    रामराम.

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  12. बस एक इस उम्मीद में, कुछ दिन तसल्ली से कटें|
    खुद अपने से ही आप कटता जा रहा हर आदमी||



    घनाक्षरी समापन पोस्ट - १० कवि, २३ भाषा-बोली, २५ छन्द

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  13. बहुत सुन्दरता एवं सरलता से आपने इस गहरे विषय का उल्लेख किया है! शायद इसी वजह से इंसान और पक्षी में इतना अंतर है! दिल को छू गई!

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  14. बड़ा उत्तम कार्य है किसी बेजुबान की मदद करना । वैसे आज कल मां बाप को उम्मीद कम ही रखनी चाहिये कि बच्चे सहारा बनेंगे अपने बुढ़ापे के लिये बचत करना ही श्रेयस्कर है ।

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  15. इसी आशा में जीवन का क्रम चलता रहता है ...

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