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शनिवार, 16 जुलाई 2011

"गीत-...गद्दार आ गये हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

सुख-चैन छीनने को, गद्दार आ गये हैं। 
टुकड़ों को बीनने को, मक्कार आ गये हैं।। 


पाये नहीं जिन्होंने, घर में नरम-निवाले, 
खुद को किया उन्होंने, इस देश के हवाले, 
फूलों  को बींधने को, कुछ खार आ गये हैं। 
टुकड़ों को बीनने को, मक्कार आ गये हैं।। 

अपने वजूद को भी, नीलाम कर दिया है, 
माता के दूध को भी, बदनाम कर दिया है, 
गंगा उलीचने को, बद-ख्वार आ गये हैं। 
टुकड़ों को बीनने को, मक्कार आ गये हैं।। 

स्यारों ने सिंह-शावक, कायर समझ लिए है, 
राणा-शिवा के वंशज, पामर समझ लिए हैं, 
सागर को लीलने को, बीमार आ गए हैं। 
टुकड़ों को बीनने को, मक्कार आ गये हैं।।

28 टिप्‍पणियां:

  1. ज़ोर से तमचियाये हो,पर लगेगा किसे ?

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  2. सही बात...टुकड़ों को बीनने को मक्कार आ गये हैं

    उत्तर देंहटाएं
  3. गंगा उलीचने को, बद-ख्वार आ गये हैं।

    रग-रग में जोश भार देने वाली इस रचना में आपने जो ऐतिहासिक पात्रों का प्रतीकात्मक प्रयोग किया है, वह बहुत ही प्रभावकारी बन पड़ा है।
    बहुत सशक्त प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  4. गद्दारो ने बदनाम किया सदा इस सर जमीं को अब समय आ गया है साफ़ सफ़ाई का देखते हैं दम कितना ईटली वाली माई का

    उत्तर देंहटाएं
  5. स्यारों ने सिंह-शावक, कायर समझ लिए है,
    राणा-शिवा के वंशज, पामर समझ लिए हैं,
    सागर को लीलने को, बीमार आ गए हैं।
    टुकड़ों को बीनने को, मक्कार आ गये हैं।।

    करारा तमाचा जड़ दिया जाये इन सब पर ...!

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत खूब ! मक्कारों का जमाना हैं शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत बढ़िया सर.

    बहुत बढ़िया सर.

    लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/

    आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.

    अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।

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  8. आपकी रचना आज तेताला पर भी है ज़रा इधर भी नज़र घुमाइये
    http://tetalaa.blogspot.com/

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  9. मेरी हार्दिक शुभकामना ||

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत खूब , मगर अफ़सोस कि ये कहीं बाहर से नहीं आये , यहीं पैदा हुए !

    हाँ, शास्त्री जी, आपने ऊपर निमंत्रण में एक शून्य ज्यादा लगा दिया है २०११ में !

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत खूब शानदार प्रस्तुति बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत शानदार प्रस्तुति बधाई|

    उत्तर देंहटाएं
  13. शेर से अकेले तो लड़ नहीं सकते...
    इसलिए सैकड़ों सियार आ गये...

    उत्तर देंहटाएं
  14. आपकी रचना अच्छी है और उम्मीद है कि कल काव्य गोष्ठी भी अच्छी ही होगी।

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  15. बहुत सटीक मारा, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  16. क्या खूब ही लिखा है ,
    शत-शत सतत बधाई ,
    देने सप्रेम हम भी
    आभार आ गए हैं !

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  17. bahut khoob likha hai shashtri ji....teer nishane pe lagaye hain..

    maaf kijiyega aapki kavya goshthi me nahi aa payenge itni dur jo baithe hain.....hame iski video dekhaeega fir

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  18. मयंक जी,
    आपने देश के गद्दारों और मक्कारों का स्वागत बहुत ज़ोरदार ढंग से किया है.....बहुत ज़रुरत थी इस वक़्त इसकी!

    उत्तर देंहटाएं
  19. जोश भरा सार्थक रचना..आभार..

    उत्तर देंहटाएं
  20. jvalant bhaav josh poorn rachna.bahut sashakt.aapka aabhar.der se padhne ke liye maaf kijiye.

    उत्तर देंहटाएं

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