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रविवार, 31 जुलाई 2011

"सियासत में तिज़ारत है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


जमाना है तिजारत का, तिज़ारत ही तिज़ारत है
तिज़ारत में सियासत है, सियासत में तिज़ारत है

ज़माना अब नहीं, ईमानदारी का सचाई का
खनक को देखते ही, हो गया ईमान ग़ारत है

हुनर बाज़ार में बिकता, इल्म की बोलियाँ लगतीं
वजीरों का वतन है ये, दलालों का ही भारत है

प्रजा के तन्त्र में कोई, नहीं सुनता प्रजा की है
दिखाने को लिखी मोटे हरफ में बस इबारत है

हवा का एक झोंका ही धराशायी बना देगा
खड़ी है खोखली बुनियाद पर ऊँची इमारत है

लगा है घुन नशेमन में, फक़त अब रूप है बाकी
लगी अन्धों की महफिल है, औ कानों की सदारत है

21 टिप्‍पणियां:

  1. समकालीन परिस्थितियों से घिरी ....गहरी ग़ज़ल है ...!!
    बहुत अच्छी लगी ..
    बधाई एवं शुभकामनायें.

    उत्तर देंहटाएं
  2. हवा का एक झोंका ही धराशायी बना देगा
    खड़ी है खोखली बुनियाद पर ऊँची इमारत है

    बहुत सुन्दर ग़ज़ल है सर...
    सादर...

    उत्तर देंहटाएं
  3. हवा का एक झोंका ही धराशायी बना देगा
    खड़ी है खोखली बुनियाद पर ऊँची इमारत है
    वह क्या बात है सर , सब तरफ तिजारत ही तिजारत है , व्वास्तव में इसके आलावा क्या रह गया है , ...... / सुंदर अभिव्यक्ति प्रशंसनीय ..... / आभार जी /

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही सुंदर और जमीनी हकीकत बयां करती रचना

    उत्तर देंहटाएं
  5. हवा का एक झोंका ही धराशायी बना देगा
    खड़ी है खोखली बुनियाद पर ऊँची इमारत है

    बेहतरीन।

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 01-08-2011 को चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.com/ पर सोमवासरीय चर्चा में भी होगी। सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  7. बोया पेंड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय...जब देश में भ्रष्टाचार कि निराई-गुड़ाई करनी थी तब इसे पोसने में लग गये...अब इस बरगद को उखाड़ने में दिक्कत तो होगी...

    उत्तर देंहटाएं
  8. प्रजा के तन्त्र में कोई, नहीं सुनता प्रजा की है
    दिखाने को लिखी मोटे हरफ में बस इबारत है

    aaj ka katu stya....kya sach mei koi nahi hai ab yahan...sunane wala????????

    उत्तर देंहटाएं
  9. ज़माना अब नहीं, ईमानदारी का सचाई का
    खनक को देखते ही, हो गया ईमान ग़ारत है
    ज़माने की सच्चाई बयां करती सार्थक ग़ज़ल।

    उत्तर देंहटाएं
  10. हवा का एक झोंका ही धराशायी बना देगा
    खड़ी है खोखली बुनियाद पर ऊँची इमारत है

    bahut hee sach!!

    उत्तर देंहटाएं
  11. क्या बात है शास्त्री जी आप तो हकीकत बयान कर गए ? बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ

    उत्तर देंहटाएं
  12. हकीकत बयाँ करती सुन्दर रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  13. बिल्कुल सही लिखा है आपने ! शानदार ग़ज़ल!

    उत्तर देंहटाएं
  14. प्रजा के तन्त्र में कोई, नहीं सुनता प्रजा की है
    दिखाने को लिखी मोटे हरफ में बस इबारत है...

    हकीकत बयाँ करती बहुत ही सुन्दर रचना...आभार...

    उत्तर देंहटाएं
  15. बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ...आभार

    उत्तर देंहटाएं

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