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शनिवार, 30 जुलाई 2011

“पंछी उड़ता नील गगन में” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

कोई ख्याल नहीं है मन में!
पंछी उड़ता नील गगन में!!

ना चिट्ठी है, ना परवाना,
मंजिल है ना कोई ठिकाना,
मुरझाए हैं फूल चमन में!
पंछी उड़ता नील गगन में!!

बिछुड़ गया नदियों का संगम,
उजड़ गया हैं दिल का उपवन,
धरा नहीं है कुछ जीवन में!
पंछी उड़ता नील गगन में!!

मार-काट है बस्ती-बस्ती,
जान हो गई कितनी सस्ती,
मौत घूमती घर-आँगन में!
पंछी उड़ता नील गगन में!!

खोज रहा हूँ मैं वो सागर,
जहाँ प्रीत की भर लूँ गागर,
गन्ध भरी हो जहाँ सुमन में!
पंछी उड़ता नील गगन में!!

22 टिप्‍पणियां:

  1. वाह बहुत ही सुन्दर
    रचा है आप ने
    क्या कहने ||
    लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/
    अगर आपको love everbody का यह प्रयास पसंद आया हो, तो कृपया फॉलोअर बन कर हमारा उत्साह अवश्य बढ़ाएँ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. मार-काट है बस्ती-बस्ती,
    जान हो गई कितनी सस्ती,
    मौत घूमती घर-आँगन में!
    पंछी उड़ता नील गगन में!!


    बहुत सुन्दर...सच्ची तस्वीर

    उत्तर देंहटाएं
  3. आज तो बहुत उदासी छायी है।

    आपकी रचना आज तेताला पर भी है ज़रा इधर भी नज़र घुमाइये
    http://tetalaa.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  4. खोज रहा हूँ मैं वो सागर,
    जहाँ प्रीत की भर लूँ गागर,
    गन्ध भरी हो जहाँ सुमन में!
    पंछी उड़ता नील गगन में!!
    udass rachna....phir bhi bahut khub...
    padhna accha laga....aabhar

    उत्तर देंहटाएं
  5. कवि तो हर जगह पहुंच ही जायेंगे, देखिये नील गगन तक छलांग लगा दी..

    उत्तर देंहटाएं
  6. bahut pyari kavita.aap ke saath hum bhi neel gagan me udne lage.ati sunder.

    उत्तर देंहटाएं
  7. अहा, बड़ी सुन्दर कविता, पंछी की तरह उन्मुक्त।

    उत्तर देंहटाएं
  8. बिछुड़ गया नदियों का संगम,
    उजड़ गया हैं दिल का उपवन,

    dil ka dard hai

    उत्तर देंहटाएं
  9. बिछुड़ गया नदियों का संगम,
    उजड़ गया हैं दिल का उपवन,
    धरा नहीं है कुछ जीवन में!
    पंछी उड़ता नील गगन में!!...

    Very emotional creation !

    .

    उत्तर देंहटाएं
  10. बधाई
    शास्त्री जी |
    नील-गगन में
    उड़ते मनहर पक्षी ||

    उत्तर देंहटाएं
  11. मार-काट है बस्ती-बस्ती,
    जान हो गई कितनी सस्ती,
    मौत घूमती घर-आँगन में!
    सरल सपाट शब्दों में अपनी बात कहने का हुनर आप में मिलता है , जो शुखद लगता है , शुक्रिया सर ...

    उत्तर देंहटाएं
  12. खोज रहा हूँ मैं वो सागर,
    जहाँ प्रीत की भर लूँ गागर,
    गन्ध भरी हो जहाँ सुमन में!
    पंछी उड़ता नील गगन में!!
    बहुत सुन्दर रचना। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  13. खोज रहा हूँ मैं वो सागर,
    जहाँ प्रीत की भर लूँ गागर,
    गन्ध भरी हो जहाँ सुमन में!
    पंछी उड़ता नील गगन में!!

    सुंदर गीत ने भावविभोर कर दिया. सरल शब्दों में रची बेहद गंभीर रचना. आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  14. dr.saheb rachana unmukat dil se nikali lagi hai.sadhuwad.jaishree krishan.hardik badhayi

    उत्तर देंहटाएं

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