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शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

"मम्मी मैं झूलूँगी झूला" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


 
अब हरियाली तीज आ रही,
मम्मी मैं झूलूँगी झूला।
देख फुहारों को बारिश की,
मेरा मन खुशियों से फूला।।

कई पुरानी भद्दी साड़ी,
बहुत आपके पास पड़ी हैं।
इतने दिन से इन पर ही तो,
मम्मी मेरी नजर गड़ी हैं।।

इन्हें ऐंठकर रस्सी बुन दो,
मेरा झूला बन जाएगा।
मैं बैठूँगी बहुत शान से,


20 टिप्‍पणियां:

  1. WAAH, KITNA SUNDER BAL GEET HAI , MAN KOHERSHA GAYA
    KOMAL BHAONAO KE SAATH KOMAL GEET PRAVAH...........

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||
    बधाई ||

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर और प्यारी तस्वीर! कोमल और मीठी कविता!

    उत्तर देंहटाएं
  4. धीरे-धीरे लोप होती जा रही हैं ये बाल सुलभ इच्छाएं और क्रीड़ायें

    उत्तर देंहटाएं
  5. कोई लौटा दे मेरे बीते हुये - झूला झूलने वाले खेल खेल मे लड़ने मिलने वाले

    उत्तर देंहटाएं
  6. बच्ची ने पुरानी साड़ी का सदुपयोग सिखा दिया...

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुखद सावन ,मन -भावन सावन ,सुन्दर रचना सामयिक प्रसंग , शुक्रिया सर !

    उत्तर देंहटाएं
  8. बाल मन को बहुत अच्छे से समझते हैं आप शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  9. बाल कविता में बच्चों को आसानी से ग्राह्य भाषा का प्रयोग बड़े सलीके से आप करते हैं.ये बहुत बड़ी खूबी है.

    उत्तर देंहटाएं

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