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मंगलवार, 12 जुलाई 2011

"बिखर जायेंगे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

रोते आये थे मगर शान्त बशर जाएँगे
आखिरी वक्त में डोली में पसर जायेंगे

अब तुम्हें अपना स्वयं ही खयाल रखना है
जाने वाले न कभी लौट के घर आयेंगे

भूल जाना वो इनायत, वो शिकायत-शिकवे
हम तो दीवार पे हँसते ही नज़र आयेंगे

आना और जाना नहीं हाथ में किसी के भी
काफिले आयेंगे, राहों से गुज़र जाएँगे

रूप रहता है सलामत न कभी फूलों का
बस घड़ी भर को खिलेंगे औबिखर जायेंगे

20 टिप्‍पणियां:

  1. जिंदगी का सीख देती रचना... बहुत बढ़िया...

    उत्तर देंहटाएं
  2. “रूप” रहता है सलामत न कभी फूलों का
    बस घड़ी भर को खिलेंगे औ’ बिखर जायेंगे

    सत्य को कहती अच्छी गज़ल

    उत्तर देंहटाएं
  3. आना और जाना नहीं हाथ में किसी के भी
    काफिले आयेंगे, राहों से गुज़र जाएँगे

    इंसान को नई राहे खुद चुननी चाहिए.. वरना तो बिखरन ही बिखरन है ......काफिले तो होते ही हैं गुजरने के लिए .....धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत खूब! बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना के लिये बधाई ..

    उत्तर देंहटाएं
  5. जीवन की सच्चाई बयान कर रही है आपकी लाजवाब गज़ल ... नमस्कार शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. लाजवाब और सुंदर बन पड़ी है कविता

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत अच्छी कविता है सर.
    ----------------

    कल 13/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  8. आना और जाना नहीं हाथ में किसी के भी ||

    बहुत बढ़िया रचना ||
    बधाई शास्त्री जी ||

    उत्तर देंहटाएं
  9. जीवन की अ -परवर्तन शील शाश्वत क्षण -भंगुरता का सार्थक यथार्थ मूलक बिम्ब .सुन्दरसंतृप्त भाव बोध .

    उत्तर देंहटाएं
  10. yahi jeevan ka antim satya hai.bahut umda ghazal likhi hai Shastri ji.

    उत्तर देंहटाएं
  11. शास्त्री जी ,नमस्कार !
    सच्चाई से रूबरू कराती रचना !
    शुभकामनायें!

    उत्तर देंहटाएं
  12. आना और जाना नहीं हाथ में किसी के भी
    काफिले आयेंगे, राहों से गुज़र जाएँगे
    लोग आते हैं ...चले जाते हैं ..समय किसी के लिए नहीं ररुकता...इस सच से सामना कराती रचना ......

    उत्तर देंहटाएं
  13. आना और जाना नहीं हाथ में किसी के भी
    काफिले आयेंगे, राहों से गुज़र जाएँगे

    बहुत खूब कहा है आपने ।

    उत्तर देंहटाएं
  14. बहुत गहरी बातें कही हैं आज आपने ..
    सुंदर रचना ..

    उत्तर देंहटाएं
  15. भूल जाना वो इनायत, वो शिकायत-शिकवे
    हम तो दीवार पे हँसते ही नज़र आयेंगे
    क्या बात है सर ! आज इतना अध्यात्म भीगा मन , कहीं रुसवाई तो नहीं देना चाहते गुलों को ? बहुत हौसला देना है अभी / भाव -प्रवर सृजन सम्मोहित कर गया / शुक्रिया जी /

    उत्तर देंहटाएं
  16. “रूप” रहता है सलामत न कभी फूलों का
    बस घड़ी भर को खिलेंगे औ’ बिखर जायेंगे


    बहुत सुन्दर ग़ज़ल...बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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