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रविवार, 31 जुलाई 2011

"सियासत में तिज़ारत है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


जमाना है तिजारत का, तिज़ारत ही तिज़ारत है
तिज़ारत में सियासत है, सियासत में तिज़ारत है

ज़माना अब नहीं, ईमानदारी का सचाई का
खनक को देखते ही, हो गया ईमान ग़ारत है

हुनर बाज़ार में बिकता, इल्म की बोलियाँ लगतीं
वजीरों का वतन है ये, दलालों का ही भारत है

प्रजा के तन्त्र में कोई, नहीं सुनता प्रजा की है
दिखाने को लिखी मोटे हरफ में बस इबारत है

हवा का एक झोंका ही धराशायी बना देगा
खड़ी है खोखली बुनियाद पर ऊँची इमारत है

लगा है घुन नशेमन में, फक़त अब रूप है बाकी
लगी अन्धों की महफिल है, औ कानों की सदारत है

शनिवार, 30 जुलाई 2011

“पंछी उड़ता नील गगन में” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

कोई ख्याल नहीं है मन में!
पंछी उड़ता नील गगन में!!

ना चिट्ठी है, ना परवाना,
मंजिल है ना कोई ठिकाना,
मुरझाए हैं फूल चमन में!
पंछी उड़ता नील गगन में!!

बिछुड़ गया नदियों का संगम,
उजड़ गया हैं दिल का उपवन,
धरा नहीं है कुछ जीवन में!
पंछी उड़ता नील गगन में!!

मार-काट है बस्ती-बस्ती,
जान हो गई कितनी सस्ती,
मौत घूमती घर-आँगन में!
पंछी उड़ता नील गगन में!!

खोज रहा हूँ मैं वो सागर,
जहाँ प्रीत की भर लूँ गागर,
गन्ध भरी हो जहाँ सुमन में!
पंछी उड़ता नील गगन में!!

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

"मम्मी मैं झूलूँगी झूला" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


 
अब हरियाली तीज आ रही,
मम्मी मैं झूलूँगी झूला।
देख फुहारों को बारिश की,
मेरा मन खुशियों से फूला।।

कई पुरानी भद्दी साड़ी,
बहुत आपके पास पड़ी हैं।
इतने दिन से इन पर ही तो,
मम्मी मेरी नजर गड़ी हैं।।

इन्हें ऐंठकर रस्सी बुन दो,
मेरा झूला बन जाएगा।
मैं बैठूँगी बहुत शान से,


गुरुवार, 28 जुलाई 2011

“सावन की ग़जलिका” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

savan ke jhoole
गन्दुमी सी पर्त ने ढक ही दिया आकाश नीला
देखकर घनश्याम को होने लगा आकाश पीला

छिप गया चन्दा गगन में, हो गया मज़बूर सूरज

पर्वतों की गोद में से बह गया कमजोर टीला

बाँटती सुख सभी को बरसात की भीनी फुहारें

बरसता सावन सुहाना हो गया चौमास गीला

पड़ गये झूले पुराने नीम के उस पेड़ पर
पास के तालाब से मेढक सुनाते सुर-सुरीला

इन्द्र ने अपने धनुष का
“रूप” सुन्दर सा दिखाया

सात रंगों से सजा है गगन में कितना सजीला
indradhanush

बुधवार, 27 जुलाई 2011

"राजनीति के दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

neta ji
 सड़कछाप भी बन गये, अब तो लक्ष्मीदास।
उल्लू बैठा शीश पर, करता भोग-विलास।1।

वाणी में ताकत बढ़ी, देह हुई बेडौल।
सत्ता पाने के लिए, रहा बोलियाँ बोल।2।

आखिर पद मिल ही गया, देकर ऊँचे दाम।
अब अपने सुख के लिए, ही होंगे सब काम।3।

पौत्र और पड़पौत्र भी, अब भोगेंगे राज।
पुश्त और दरपुश्त तक, करना पड़े न काज।4।

यदि घोटाले खुल गये, मैं जाऊँगा जेल।
लेकिन कुछ दिन बाद ही, मिल जाएगी बेल।5।

जनता की होती बहुत, याददास्त कमजोर।
बिसरा देती है सदा, कपटी-कामी-चोर।6।

जितना चाहे लूट ले, तेरी है सरकार।
सरकारी धन-सम्पदा, पर तेरा अधिकार।7।

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

“अब भी बाकी है........” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

     पिछले कई वर्षों से मैं दो-मंजिले पर रहता हूँ। मेरे कमरे में तीन रोशनदान हैं। उनमें जंगली कबूतर रहने लगे थे। वहीं पर वो अण्डे भी देते थे, परन्तु कानिश पर जगह कम होने के कारण अण्डे नीचे गिर कर फूट जाते थे। मुझे यह अच्छा नही लगता था।

      एक दिन कुछ फर्नीचर बनवाने के लिए बढ़ई लगाया तो मुझे कबूतरों की याद आ गयी। मैंने बढ़ई से उनके लिए दो पेटी बनवा ली और किसी तरह से उनको रोशनदान में रखवा दिया।

      अब कबूतर उसमें बैठने लगे। नया घर पाकर वो बहुत खुश लगते थे। धीरे-धीरे कबूतर-कबूतरी ने पेटी में तिनके जमा करने शुरू कर दिये। थोड़े दिन बाद कबूतरी ने इस नये घर में ही अण्डे दिये। कबूतर और कबूतरी बारी-बारी से बड़े मनोयोग से उन्हें सेने लगे।

      एक दिन पेटी में से चीं-चीं की आवाज सुनाई देने लगी। अण्डों में से बच्चे निकल आये थे। अब कबूतर और कबूतरी उनको चुग्गा खिलाने लगे। धीरे-धीरे बच्चों के पर भी निकलने शुरू हो गये थे। एक दिन मैंने देखा कि कबूतरों के बच्चे उड़ने लगे थे। जैसे ही उनके पूरे पंख विकसित हो गये वे घोंसला छोड़ कर पेटी से उड़ गये ।

jangali kabutar      आज भी यह क्रम नियमित रूप से चल रहा है। कबूतर अण्डे देते हैं। अण्डों में से छोटे-छोटे बच्चे निकलते हैं और पंख आने के बाद उड़ जाते हैं। क्या संसार की यही नियति है? बालक जवान होते ही माता-पिता को ऐसे छोड़ कर चले जाते हैं जैसे कि कभी उनसे कोई नाता ही न रहा हो और माता-पिता देखते रह जाते हैं।

     वे पुनः घोंसले में अण्डे देते हैं। उन्हें इस उम्मीद से सेते हैं कि इनमें से निकलने वाले बच्चे बड़े होकर हमारे बुढ़ापे का सहारा बनेंगे।

      शायद उनके मन में आशा की एक किरण अब भी बाकी है........

सोमवार, 25 जुलाई 2011

“पथ निखर ही जाएगा” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

आज अपना हम सँवारें, कल सँवर ही जायेगा
आप सुधरोगे तो सारा, जग सुधर ही जाएगा
 
जो अभी कुछ घट रहा है, वही तो इतिहास है
देखकर नक्श-ए-कदम को, रथ उधर ही जाएगा
 
रास्ते कितने मिलेंगे, सोचकर पग को बढ़ाना
आओ मिलकर पथ बुहारें, पथ निखर ही जाएगा
 
एकता और भाईचारे में, दरारें मत करो
वरना ये गुलदान पल भर में, बिखर ही जाएगा
 
चमन में फूलों का सबको “रूप” भाता है बहुत
गर मिलेगी गन्ध तो, भँवरा पसर ही जाएगा

रविवार, 24 जुलाई 2011

"नाराज नहीं होकर जाना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



हँसी-खुशी से आये हो, नाराज नहीं होकर जाना
जीवन के अनुरक्त तरानों को, खुश हो करके गाना

मंजिल को यदि पाना है तो, चलते ही रहना होगा
मत होना निराश, पथ की बाधाओं से मत घबराना

चलने का है का नाम ज़िन्दगी, रुकना मौत कहाता है
बहती नदियों जैसा जीवन ही तुमको है अपनाना

बुरे-भले को बहती धारा ही तो निर्मल करती है
दुर्गन्धों को अपने संसर्गों में लाकर महकाना

रूप और मालिन्य हटाकर अपने रँग में रँग देना
जीवन का सन्देश तुम्हें है सारे जग को सिखलाना 

शनिवार, 23 जुलाई 2011

"ग़ज़ल-...आज कुछ लम्हें चुराने हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



सुहाते ही नहीं जिनको मुहब्बत के तराने हैं
हमारे मुल्क में ऐसे अभी बाकी घराने हैं

जिन्हें भाते नहीं हैं, फूल इस सुन्दर बगीचे के
ज़हन में आज भी ख्यालात उनके तो पुराने हैं

नई दुनिया-नई नस्लें, नई खेती-नई फसलें,
मगर उनको तो अब भी, ढोर ही जाकर चराने हैं

नहीं है अब ज़माना, शान से शासन चलाने का,
नहीं है प्यार गर दिल में, तो अपने भी बिराने हैं

फिज़ाओं ने बहुत तेजी से अपना रूप बदला है,
मुहब्बत के लिए ही आज कुछ लम्हें चुराने हैं

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

"दोहा सप्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


गंगा, यमुना-शारदा, का संगम अभिराम।
श्रम, बुद्धि औज्ञान से, बनते सारे काम।1।

ले जाता है गर्त में, मानव को अभिमान।
जो घमण्ड में चूर हैं, उनको गुणी न जान।2।

चूहा कतरन पाय कर, थोक बेचता वस्त्र।
अज्ञानी ही घोंपता, ज्ञानवान को शस्त्र।3।

हो करके निष्काम जो, बाँट रहा है ज्ञान।
कोशिश करता वो यही, मिट जाए अज्ञान।4।

जो भी असली शिष्य हैं, वो गुरुओं के भक्त।
जो कृतघ्न थे हो गये, पाकर हुनर विरक्त।5।

जब जग को लगने लगा, डूब रही है नाव।
बिन माँगे देने लगे, अपने कुटिल सुझाव।6।

बात-चीत से धुल गये, मन के सब सन्ताप।
गुरू-शिष्य अब मिल गये, रहा न पश्चाताप।7।

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

"ग़ज़ल...क्यों हार की बातें करें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

सादगी के साथ हम, शृंगार की बातें करें
जीत के माहौल में, क्यों हार की बातें करें

सोचने को उम्र सारी ही पड़ी है सामने,
प्यार का दिन है सुहाना, प्यार की बातें करें

रंग मौसम ने भरे हैं, आ गया ऋतुराज है,
रंज-ओ-ग़म को छोड़कर, त्यौहार की बातें करें

मन-सुमन से मिल गये, गुञ्चे चमन में खिल गये,
आज के दिन हम, नये उपहार की बातें करें

प्रीत है इक आग, इसमें ताप जीवन भर रहे,
हम सदा सुर-ताल, मृदु झंकार की बातें करें

"रूप" कब तक साथ देगा, नगमग़ी बाज़ार में,
साथ में मिल-बैठकर, परिवार की बातें करें

बुधवार, 20 जुलाई 2011

"बेवफा से वफा की उम्मीद ही बेकार हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

इस ग़ज़ल में एकवचन-बहुवचन का दोष है।
चित्त एकाग्र होने पर सुधार कर लूँगा!


थे कभी शागिर्द जो करने लगे वो वार हैं
गुर नहीं जो जानते लेकर खड़े हथियार हैं

तीर तरकश में बहुत होंगे हमें सब कुछ पता,
फूल भी अपने चमन के बन गये अब खार हैं

है बहुत बेचैन दिल नादानियों को देखकर,
अमन के पैगाम में बढ़ने लगी तकरार है

साथ परछाई नही देती कभी तंगहाल में
ज़र के पीछे भागते देखे यहाँ किरदार हैं

जो न अपनों का हुआ गैरों का होगा क्या भला
बेवफा से वफा की उम्मीद ही बेकार है

जब यक़ीदा ही नहीं व्यापारियों के बीच में
इस पार हम उस पार वो और बीच में दीवार है

हो भले ही दुश्मनी लेकिन समझदारी तो हो
अब दरकते पर्वतों के मिट गये आधार हैं

रूप नालों ने दिखाया जब हुई बरसात है
झूठ का व्यापार है खुदगर्ज़ ये संसार है 

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

"मैंने पाषाण बनाया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

सबसे पहले यह गीत पढ़िए  
 जितने ज्यादा आघात मिले,
उतना ही साहस पाया है।
मृदु मोम बावरे मन को अब,
मैंने पाषाण बनाया है।।

था कभी फूल सा कोमल जो,
सन्तापों से मुरझाता था,
पर पीड़ा को मान निजी,
आकुल-व्याकुल हो जाता था,
इस दुनिया का व्यवहार देख,
पथरीला पथ अपनाया है।
मृदु मोम बावरे मन को अब,
मैंने पाषाण बनाया है।।

चिकनी-चुपड़ी सी बातों का,
अब असर नहीं कोई होता,
जिससे जल-प्लावन होता था,
वो कब का सूख गया सोता,
जो राग जगत ने है गाया,
मैंने वो साज बजाया है,
मृदु मोम बावरे मन को अब,
मैंने पाषाण बनाया है।।

झूठी माया, है झूठा जग,
छिपकर बैठे हैं भोले ठग,
बाहर हैं दाँत दिखाने के,
खाने के मुँह में छिपे अलग,
कमजोर समझकर शाखा को,
दीमक ने पाँव जमाया है।
मृदु मोम बावरे मन को अब,
मैंने पाषाण बनाया है।।

अब यह 1 मिनट का वीडिओ देखिए! 
साहित्य शारदा मंच खटीमा के बैनर तले एक कविगोष्ठी का आयोजन किया गया!
साधना न्यूज चैमल द्वारा इसकी कवरेज दिखाई गयी!
आयोजक-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"

सोमवार, 18 जुलाई 2011

"खटीमा में कविगोष्ठी सम्पन्न." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

आज खटीमा (उत्तराखण्ड) में वर्षा ऋतु के स्वागत में 
सावन के प्रथम दिन राष्ट्रीय वैदिक विद्यालय में 
एक कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया!
गोष्ठी का शुभारम्भ और अतिथियों का स्वागत किया गया!
गोष्ठी की अध्यक्षता रामनगर नैनीताल के पधारे 
शायर सगीर अशरफ ने की,

मुख्यअतिथि- कवि एवं साहित्यकार अशोक् कुमार भट्ट
(अ.पुलिस अधीक्षक-ऊधमसिंहनगर) तथा
विशिष्ट अतिथि- मा. पुष्कर सिंह धामी 
(राज्यमन्त्री-उत्तराखण्ड सरकार) थे।
जिसका संचालन कवि देवदत्त प्रसून" किया!
इसके पश्चात अतिथियों के द्वारा 
माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण 
एवं दीप प्रज्वलन किया गया।
गोष्ठी का शुभारम्भ देवदत्त प्रसून की सरस्वती वन्दना से हुआ।

 
खटीमा राजकीय महाविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष 
डॉ. सिद्धेश्वर सिंह ने अपना काव्य पाठ किया-

आइए इक ख़त लिखें हम जिन्दगी के नाम।

उम्र की ना-आशना आवारगी के नाम।।"

तत्पश्चात राजकीय इंटर कॉलेज में हिन्दी के प्राध्यापक
 डॉ. गंगाधर राय ने राजनीतिक परिपेक्ष्य में चुटकी लेते हुए कहा-

सत्ता की कुर्सी पर बैठकर तुमने 
लिया है मामा कंस का अवतार।
इसलिए प्रजातन्त्र को 
कर दिया है तुमने तार-तार।।


राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत सरस पायस के सम्पादक
ने अपने काव्य पाठ में नवगीत का स्स्वर पाठ किया।


हास्य व्यंग्य के कवि गेंदालाल शर्मा निर्जन ने कहा-
सारे देश में घूम के देखो बेईमानों का ढेर है,
कर्णधार जो देश के वो चिकनी मिट्टी के शेर हैं।

प्रवीण सिंह प्रजापति ने ने भी हास्य का शमा बाँधते हुए कहा-
मैं दीवानी ढूँढता हूँ, मैं दीवाना हूँ,
मैं दीवानी ढूँढती हूँ, मैं दीवानी हूँ,...
--
पीलीभीत से पधारे गजलकार राम किशोर शर्मा ने कहा-
आ स्वयं दिवाकर सन्धि करे,
कल का फिर प्रातनहीं होगा.....
पीलीभीत से ही पधारे ओज के कवि पुष्पेन्द्र शर्मा दीप ने कहा-
हर दफा ये कमाल होता है,
सबके दिल को मलाल होता है....
पीलीभीत के सिद्धकवि जीतेश राज ने 
अपनी ग़ज़ल पेश करते हुए कहा-
जरा मुट्ठी में सारा जहान भरते हैं!
ये मन के पंछी भी कैसी उड़ान भरते है....
खटीमा के प्रख्यात चिकित्सक डॉ. चन्द्र शेखर जोशी ने कहा-

मेरे बगल के खेत में एक मकान उग आया है,
पड़ोसी का कबूतर फिर, नमकीन-बिस्कुट चुग आया है....


किच्छा से पधारे शायर नबी अहमद मंसूरी ने कहा-
नियामत है ये खुदा की
कहीं बारिश कही कहर है....
रूमानियत के शायर 
गुरू सहाय भटनागर बदनाम ने कहा
देश पर फिदा जानो तन कर गये,
जान देकर भी रौशन यहाँ कर गये
सितारगंज से पधारे शायर यूनुस मलिक ने कहा-
तिफ्ल जो मुफलिसी में पलते हैं,
वो खिलौनों को कब मसलते हैं....
लालकुँआ नैनीताल से पधारीं 
शैलसूत्र पत्रिका की सम्पादिका श्रीमती आशा शैली ने कहा-
बस परिन्दों की तरह नजर आते हैं लोग
जिन्दगी की राह मैं ऐसे भी मिल जाते हैं लोग...

युवा कवि कमलेश भट्ट ने कहा-
कल हम न होंगें तो क्या हमें याद करोंगे,
अगर याद करोगे ते हमें पास कहाँ पाओगे?....
संचालक देवदत्त प्रसून ने कहा-

बात हामारी तुमको अच्छी नहीं लगी
सच्ची थी लेकिन वो तुमको अच्छी नहीं लगी....


गोष्ठी के आयोजक डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा-
बड़ी हसरत दिलों में थी गगन में छा गये बादल!
हमारे गाँव में भी आज चलकर आ गये बादल!!
मुख्य अतिथि कवि एवं साहित्यकार अशोक् कुमार भट्ट ने कहा-
सफलताओं ने दिये मुझे सिर्फ ठहराव।
रही घाट में बँधी वह कैसी नाव…”
इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि मा. पुष्कर सिंह धामी 
(राज्यमन्त्री-उत्तराखण्ड सरकार) ने अपने उद्बोधन में कहा 
कि यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे आज 
खटीमा और सुदूर स्थानों से पधारे कवियों की 
रचनाओं का रसास्वादन करने का अवसर मिला। 
इस अवसर पर उन्होंने अपने छात्र जीवन में लिखी 
रचना का पाठ करते हुए कहा-

स्वतन्त्रता के प्रेमी की अम्बर के आगे सीमा है,
उसकी क्षमता के आगे तूफान बहुत ही धीमा है!


गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे शायर सगीर अशरफ ने कहा-
तेरे दर से अपना घर तलाश करता हूँ!
मैं आज कोई सिकन्दर तलाश करता हूँ!
अन्त में-
मुख्यअतिथि कवि एवं साहित्यकार अशोक् कुमार भट्ट 
(अ.पुलिस अधीक्षक-ऊधमसिंहनगर) को 
साहित्य शारदा मंच के अध्यक्ष डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने 
संस्था के सर्वोच्च सम्मान साहित्य श्री से अलंकृत किया, 
जिसे विशिष्ट अतिथि मा. पुष्कर सिंह धामी 
(राज्यमन्त्री-उत्तराखण्ड सरकार) के 
कर कमलों से प्रदान किया गया!
आभार दर्शन करते हुए आयोजक डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने 
सभी को हरेला और शब्बेबारात की शुभकामनाएँ भी प्रेषित कीं!

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