"कव्वाली"
लिखने-पढ़ने का मन भी नही है।
गीत रचने का मन ही नही है।
इश्क करने का मन ही नहीं है।
मेरा मिलने का मन ही नहीं है।
अब सँवरने का मन ही नहीं है।
वार करने का मन ही नहीं है।
लड़ने-भिड़ने का मन ही नहीं है।
शेर गढ़ने का मन ही नहीं है। |
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सच कहें तो अनशनकारी से लेकर अत्याचारी तक दोनो को देख मन खट्टा है अब अन्ना से ही आस टिकी है ।
जवाब देंहटाएंमन के हारे हार है ...मन के जीते जीत ....
जवाब देंहटाएंआपकी कव्वाली पढने के बाद फिर से एक बार ये बात याद आ गई
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anu radha
sachmuch ab man nahin hai....
जवाब देंहटाएंbahut khoob !
आपकी रचना यहां भ्रमण पर है आप भी घूमते हुए आइये स्वागत है
जवाब देंहटाएंhttp://tetalaa.blogspot.com/
कल से जो हाल है हमारा भी शायद उस पर भी आपकी ये रचना सही बैठती है।
एक हमले ने ताकत है छीनी,
जवाब देंहटाएंलड़ने-भिड़ने का मन ही नहीं है।
शर्मशारी में दिन सारा बीता,
शेर गढ़ने का मन ही नहीं है।
इतनी निराशा कयों सर? आपलोगों का यह हाल होगा तो नौजवानों को कौन ढाँढस देगा? कौन उम्मीद बँधाएगा? वैसे रचना तो बहुत अच्छी है पर आशान्वित रहना हमारी आवश्यकता और मज़बूरी दोनो है।...सादर
यूँ निराश होने से भी काम नहीं चलेगा ...फिर से मन को उठाना होगा ..जगाना होगा .. अच्छी प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंशास्त्री जी , आप तो ज्ञानी है,और आप कह भी ठीक रहें है !
जवाब देंहटाएंवक्त की आँधियों ने डराया,
वार करने का मन ही नहीं है।
ये वक्त भी निकल जायेगा ...
शुभकानाएं !
आपने बहुत सुंदरता से हरेक दिल के दर्द को शब्द दिए हैं..अब तो केवल अन्ना का सहारा है, वैसे इस सरकार का कुछ भी भरोसा नहीं. बहुत सुन्दर रचना...आभार
जवाब देंहटाएंवाह ...बहुत खूब ।
जवाब देंहटाएंचर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी (कोई पुरानी या नयी ) प्रस्तुति मंगलवार 14 - 06 - 2011
जवाब देंहटाएंको ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..
साप्ताहिक काव्य मंच- ५० ..चर्चामंच
श्रद्धेय शास्त्री जी
जवाब देंहटाएंटिप्पणी लिखने का मन तो बनाना ही पडेगा,
चाहे ४ जून से एक जून भी चैन न आया हो |
और बर्बरता ने सैकड़ों जुल्म ढाया हो ||
adviteeya rachna!
जवाब देंहटाएंमन खिन्न हो,
जवाब देंहटाएंतो भाव भिन्न हो।
देश में जो माहौल है इस समय , उससे तो मन खिन्न होना ही है । फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है।
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