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सोमवार, 2 जुलाई 2012

"ढाई आखर प्रेम का" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


ढाई आखर प्रेम का, देता है सन्ताप।
हार-जीत के खेल में, बढ़ जाता है ताप।१।

सच्चाई के साथ में, निर्धन करता प्यार।
मक्कारी से है भरा, धनवानों का प्यार।२।

प्यार नहीं है वासना, ये तो है अनुबन्ध।
प्यार शब्द से जुड़ा है, तन-मन का सम्बन्ध।३।

प्यार जगत में छेड़ता, मन वीणा के तार।
कुदरत ने हमको दिया, ये अमोल उपहार।४।

सिर्फ दिखावे के लिए, ढोंगी करता प्यार।
चटके दर्पण की कभी, मिटती नहीं दरार।५।

21 टिप्‍पणियां:

  1. वाह....

    बहुत सुन्दर रचना....
    प्रेम की सच्ची व्याख्या.........

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  2. प्रेमकी अनुपम प्रस्तुति..आभार..

    उत्तर देंहटाएं
  3. सिर्फ दिखावे के लिए, ढोंगी करता प्यार।
    चटके दर्पण की कभी, मिटती नहीं दरार।

    प्रेम की गहन अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत बढ़िया ढंग से प्रेम की काव्यमय व्याख्या.

    उत्तर देंहटाएं
  5. ...प्यार बिना तो सब जग सुना!

    उत्तर देंहटाएं
  6. आखिरी दोहा गहरे उतर गया.

    उत्तर देंहटाएं
  7. प्रेम की अनुपम व्याख्या.........
    सादर्

    उत्तर देंहटाएं
  8. समझाते हैं प्यार से, कई अनोखे भेद |
    हार-जीत के खेल में, बहता काफी स्वेद |
    बहता काफी स्वेद, खेद आलस सब दीजै |
    कठिन परिश्रम रोज, संग में मिलकर कीजै |
    सौ प्रतिशत संयोग, किन्तु ना लेना हल्का |
    बड़े चतुर हैं लोग, जरुरी दिन है कल का ||

    उत्तर देंहटाएं
  9. अंतिम पंक्तियों ने कमाल कर दिया ...बहुत बढ़िया सर....

    उत्तर देंहटाएं
  10. सिर्फ दिखावे के लिए, ढोंगी करता प्यार।
    चटके दर्पण की कभी, मिटती नहीं दरार!
    ऐसे प्रेम का तो यही हश्र होना था !
    अच्छी कविता !

    उत्तर देंहटाएं
  11. ढाई आखर प्रेम का, देता है सन्ताप।
    हार-जीत के खेल में, बढ़ जाता है ताप...

    A bitter truth...

    .

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं

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