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रविवार, 15 जुलाई 2012

"सावन में...." (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


सपनों में ही पेंग बढ़ाते, झूला झूलें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गानें भी, हमने भूलें सावन में।।

मँहगाई की मार पड़ी है, घी और तेल हुए महँगे,
कैसे तलें पकौड़ी अब, पापड़ क्या भूनें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गानें भी, हमने भूलें सावन में।।

हरियाली तीजों पर, कैसे लायें चोटी-बिन्दी को,
सूखे मौसम में कैसे, अब सजें-सवाँरे सावन में।
मेघ-मल्हारों के गानें भी, हमने भूलें सावन में।।

आँगन के कट गये नीम,बागों का नाम-निशान मिटा,
रस्सी-डोरी के झूले, अब कहाँ लगायें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गानें भी, हमने भूलें सावन में।।

21 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सटीक पंग्तियाँ,
    सावन पे महगाई भारी......!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. कुछ भूल रहे हैं
    अच्छा याद दिलाया
    सावन में एक सुंदर
    सा गीत बनाया ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. अच्छा याद दिलाया
    सावन में एक सुंदर
    उमड़-घुमड़कर
    "रिम-झिम,
    रिम-झिम वर्षा
    http://santoshbihar.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं
  4. आँगन के कट गये नीम,बागों का नाम-निशान मिटा,
    रस्सी-डोरी के झूले, अब कहाँ लगायें सावन में।
    आदरणीय शास्त्री जी बहुत सुन्दर ..सावन मन भावन सच में रंग ही फीका दिखा रहा है दोषी तो हम सब कुछ हैं ही ...
    जो जो कमियाँ दिखीं यहाँ पर भूल न जाए सावन में
    पेड़ लगायें एक एक तो हरियाली आये सावन में
    भ्रमर ५

    उत्तर देंहटाएं
  5. सावन का सुन्दर चेहरा दिखाया है ..सुन्दर लिखा है..

    उत्तर देंहटाएं
  6. रस्सी-डोरी के झूले, अब कहाँ लगायें सावन में।
    मेघ-मल्हारों के गानें भी, हमने भूलें सावन में।।theek bole.....sir.

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत ही खुबसूरत सावन में भीगी पंक्तिया....

    उत्तर देंहटाएं
  8. आँख या बादल, किसका पानी देखें हम..

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  9. बहुत सुंदर
    ऐसी रचनाएं पढने से लगता है कि सावन आ गया

    उत्तर देंहटाएं
  10. हरियाली तीज की याद दिला दी है आपने |
    आशा

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  11. बहुत ख़ूब!
    आपकी यह सुन्दर प्रवृष्टि कल दिनांक 16-07-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-942 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  12. सार्थक भाव व्यक्त करती रचना

    उत्तर देंहटाएं
  13. आभार गुरु जी -

    बढ़िया गीत ।।



    हर शाखा पर उल्लू बैठे, कैसे झूला डाल सकेंगे ।

    हरियाली सावन की लेकिन , उल्लू नहीं हकाल सकेंगे ।

    हुआ असर यह मँहगाई का, गाई गई महज मँहगाई -

    पानी पर ही तले पकौड़े, पैबन्दों से लाज ढकेंगे ।।

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  14. सावन में .
    .बहुत सुन्दर कविता..
    आज भी सावन में झूले याद आते हैं..

    उत्तर देंहटाएं
  15. वाह ... बेहतरीन भाव लिय उत्‍कृष्‍ट लेखन ...आभार

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  16. बहुत लाजवाब रचना, शुभकामनाएं.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  17. सावन अबकी महगां पड़ा, महगां पडा त्यौहार
    महगाई के इस मार से ,भूल रहे है शिष्टाचार,,,,,

    उत्तर देंहटाएं

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