नदिया-नाले सूख रहे हैं, जलचर प्यासे-प्यासे हैं। पौधे-पेड़ बिना पानी के, व्याकुल खड़े उदासे हैं।। चौमासे के मौसम में, सूरज से आग बरसती है। जल की बून्दें पा जाने को, धरती आज तरसती है।। नभ की ओर उठा कर मुण्डी, मेंढक चिल्लाते हैं। बरसो मेघ धड़ाके से, ये कातर स्वर में गाते हैं।। दीन-कृषक है दुखी हुआ, बादल की आँख-मिचौली से। पानी अब तक गिरा नही, क्यों आसमान की झोली से? तितली पानी की चाहत में दर-दर घूम रही है। फड़-फड़ करती तुलसी की ठूँठों को चूम रही है।। दया करो घनश्याम, सुधा सा अब तो जम करके बरसो। रिमझिम झड़ी लगा जाओ, अब क्यों करते कल-परसों? |
सोमवार, 23 जुलाई 2012
"धरती आज तरसती है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
| Reactions: |
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
बरसो रे मेघा मेघा
प्रत्युत्तर देंहटाएंबरसो रे मेघा बरसो ..
बहुत सुंदर आग्रह बादलों से ..
सादर !
नदिया-नाले सूख रहे हैं, जलचर प्यासे-प्यासे हैं।
प्रत्युत्तर देंहटाएंपौधे-पेड़ बिना पानी के, व्याकुल खड़े उदासे हैं।।
समयानुकूल वेदना पूर्ण आग्रह -सुन्दर, मनोहर -बरसों राम धडाके से भ्रष्ट मारें सब फाके से,डूबें गंदे नालें में .
समयानुकूल वेदना पूर्ण आग्रह -सुन्दर, मनोहर -बरसों राम धडाके से भ्रष्ट मारें सब फाके से,डूबें गंदे नालें में . कृपया यहाँ भी दस्तक देवें -
प्रत्युत्तर देंहटाएंram ram bhai
सोमवार, 23 जुलाई 2012
कैसे बचा जाए मधुमेह में नर्व डेमेज से
कैसे बचा जाए मधुमेह में नर्व डेमेज से
http://veerubhai1947.blogspot.de/
sundar guhaar ..!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंshubhkamnayen
Shastri Sir....कई द्रवित , पीड़ित लोगों की आवाज़ सुनाई दे रही है आपकी इस कविता में !
प्रत्युत्तर देंहटाएंसादर !!!
दया करो घनश्याम, सुधा सा अब तो जम करके बरसो।
प्रत्युत्तर देंहटाएंरिमझिम झड़ी लगा जाओ, अब क्यों करते कल-परसों?
जन जन की आवाज ही नही समस्त जड़ चेतन
की पीड़ा का अनुभव हो रहा है आपकी मार्मिक
प्रस्तुति में.
आभार,शास्त्री जी.
बहुत बढ़िया प्रस्तुती, सुंदर रचना,,,,,
प्रत्युत्तर देंहटाएंRECENT POST काव्यान्जलि ...: आदर्शवादी नेता,
बहुत सुंदर, अर्थपूर्ण पंक्तियाँ ....
प्रत्युत्तर देंहटाएंदीन-कृषक है दुखी हुआ, बादल की आँख-मिचौली से।
प्रत्युत्तर देंहटाएंपानी अब तक गिरा नही, क्यों आसमान की झोली से?
intezar hai.
बरसो मेघ, तरसते बीज, आँख खुलना चाहें...
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुंदर आग्रह ..खुबसूरत प्रस्तुति...
प्रत्युत्तर देंहटाएंदया करो घनश्याम, सुधा सा अब तो जम करके बरसो।
प्रत्युत्तर देंहटाएंरिमझिम झड़ी लगा जाओ, अब क्यों करते कल-परसों?
ham bhi is prarthna me shamil hain.
सूखे के आसार हैं, बही नहीं जलधार ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंहैं अषाढ़ सावन गए, कर भादौं उपकार ।।
वाह ... बहुत खूब।
प्रत्युत्तर देंहटाएंकल 25/07/2012 को आपकी इस पोस्ट को नयी पुरानी हलचल पर लिंक किया जा रहा हैं.
आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!
'' हमें आप पर गर्व है कैप्टेन लक्ष्मी सहगल ''
बहुत सुंदर............
प्रत्युत्तर देंहटाएंउत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के चर्चा मंच पर ।।
प्रत्युत्तर देंहटाएंमनुष्य, जीव-जंतु, खेत-खलिहान सभी प्यासे हैं, इस भावपूर्ण गीत को सुनकर अब तो मेघ बरसेगा ही. सुन्दर रचना, बधाई.
प्रत्युत्तर देंहटाएंदीन-कृषक है दुखी हुआ, बादल की आँख-मिचौली से।
प्रत्युत्तर देंहटाएंपानी अब तक गिरा नही, क्यों आसमान की झोली से?
बहुत बढिया प्रस्तुति।
बहुत सुन्दर!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंदया करो घनश्याम, सुधा सा अब तो जम करके बरसो।
प्रत्युत्तर देंहटाएंरिमझिम झड़ी लगा जाओ, अब क्यों करते कल-परसों?
बहुत सुंदर !
घन श्याम अब तो आ जाओ
सूखा आसमान ही नहीं है
सब जगह नजर आ रहा है
आदमी पानी के अलावा
बहुत सी और जगह पर भी
प्यासा रह जा रहा है !
सुंदर गुहार ....
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत सुन्दर सार्थक सन्देश परक पंक्तियाँ हर चीज कि महत्ता समय के अनुसार होती है फसलों को इस वक़्त पानी कि जरूरत है और मेघ राजा हैं कि सुनते ही नहीं
प्रत्युत्तर देंहटाएं"दीन-कृषक है दुखी हुआ, बादल की आँख-मिचौली से।
प्रत्युत्तर देंहटाएंपानी अब तक गिरा नही, क्यों आसमान की झोली से?"
अर्थ पूर्ण वर्जना.. अति सुंदर..