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शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

"परबत बनेंगे, सड़क धीरे-धीरे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


बढ़ेंगे तुम्हारी तरफ धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

नया है मुसाफिर, नयी जिन्दगी है,
नया फलसफा है, नयी बन्दगी है,
पढ़ेंगे-लिखेंगे, बरक धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

उल्फत की राहों की सँकरी गली है,
अभी सो रही गुलिस्ताँ की कली है,
मिटेगा दिलों का फरक धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

दुर्गम डगर में हैं चट्टान भारी,
हटानी पड़ेंगी, परत आज सारी,
परबत बनेंगे, सड़क धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

20 टिप्‍पणियां:

  1. गजब प्रस्तुति |
    मजा आ गया -
    सस्वर गुनगुनाने में ||

    उत्तर देंहटाएं
  2. बड़े सहज ढंग से कह जाते हें आप गहरी बात. बहुत अच्छी रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत सुंदर लाजबाब गीत,,,,,शास्त्री जी बधाई,,,,,

      RECENT POST,,,इन्तजार,,,

      हटाएं
  4. दुर्गम डगर में हैं चट्टान भारी,
    हटानी पड़ेंगी, परत आज सारी,
    परबत बनेंगे, सड़क धीरे-धीरे।
    जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

    बहुत खूब !
    अब पक्का सीखेंगे हम भी धीरे धीरे
    क्या आप भी लिख रहे हैं धीरी धीरे
    सबके ब्लाग खोलेंगे हम धीरे धीरे
    कुछ ना कुछ जरूर बोलेंगे धीरे धीरे !!!

    उत्तर देंहटाएं
  5. हटानी पड़ेंगी, परत आज सारी,
    परबत बनेंगे, सड़क धीरे-धीरे।
    वाह शास्त्री जी -हटानी पड़ेंगी, परत आज सारी,
    परबत बनेंगे, सड़क धीरे-धीरे।क्या बात है आपकी बे -लाग अंदाज़ ......कृपया यहाँ भी पधारें -

    कविता :पूडल ही पूडल
    कविता :पूडल ही पूडल
    डॉ .वागीश मेहता ,१२ १८ ,शब्दालोक ,गुडगाँव -१२२ ००१

    जिधर देखिएगा ,है पूडल ही पूडल ,
    इधर भी है पूडल ,उधर भी है पूडल .

    (१)नहीं खेल आसाँ ,बनाया कंप्यूटर ,

    यह सी .डी .में देखो ,नहीं कोई कमतर

    फिर चाहे हो देसी ,या परदेसी पूडल

    यह सोनी का पूडल ,वह गूगल का डूडल .

    उत्तर देंहटाएं
  6. चर्चा मंच विशेष रहा जितने पढ़े लिंक सभी पे टिपियाए बिना रहा न गया ......कृपया यहाँ भी पधारें -

    कविता :पूडल ही पूडल
    कविता :पूडल ही पूडल
    डॉ .वागीश मेहता ,१२ १८ ,शब्दालोक ,गुडगाँव -१२२ ००१

    जिधर देखिएगा ,है पूडल ही पूडल ,
    इधर भी है पूडल ,उधर भी है पूडल .

    (१)नहीं खेल आसाँ ,बनाया कंप्यूटर ,

    यह सी .डी .में देखो ,नहीं कोई कमतर

    फिर चाहे हो देसी ,या परदेसी पूडल

    यह सोनी का पूडल ,वह गूगल का डूडल .

    उत्तर देंहटाएं
  7. उल्फत की राहों की सँकरी गली है,
    अभी सो रही गुलिस्ताँ की कली है,
    मिटेगा दिलों का फरक धीरे-धीरे।
    जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।...बहुत खुबसूरत गीत.. आनंद आरहा है धीत्रे धीरे..

    उत्तर देंहटाएं
  8. नया है मुसाफिर, नयी जिन्दगी है,
    नया फलसफा है, नयी बन्दगी है,
    पढ़ेंगे-लिखेंगे, बरक धीरे-धीरे।
    जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

    बहुत प्यारी रचना

    उत्तर देंहटाएं
  9. नया है मुसाफिर, नयी जिन्दगी है,
    नया फलसफा है, नयी बन्दगी है,

    बहुत ही अच्‍छी भावमय करती प्रस्‍तु‍ति ... आभार

    उत्तर देंहटाएं
  10. आदरणीय शास्त्री जी पढ़कर मज़ा आ गया, सुन्दरता के परिपूर्ण इक और ग़ज़ल, तहे दिल से दाद कुबूल कीजिये......

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत सुंदर गीत... वाह! आनंद आ गया...
    सादर।

    उत्तर देंहटाएं
  12. सब धीरे धीरे होता है,
    पर्वत सड़कों में खोता है।

    उत्तर देंहटाएं
  13. आज अलग अंदाज का गीत है। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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