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रविवार, 29 जुलाई 2012

"जैविक पिता और लांछित पिता की त्रासदी" (दयानन्द पाण्डेय)

जैविक पिता और लांछित पिता की त्रासदी (दयानन्द पाण्डेय)
      सोचिए कि कर्ण को जब पता चला होगा कि सूर्य उस के नाज़ायज़ पिता हैं तो क्या कर्ण ने भी कभी मांग की होगी सूर्य से कि अपनी रोशनी और अपनी आग मुझे भी दे दो नहीं मैं तुम्हें बदनाम कर दूंगा? खैर, नारायणदत्त तिवारी अब रोहित शेखर के प्रमाणित पिता हो गए हैं। डी.एन.ए. रिपोर्ट का खुलासा हो गया है। रोहित शर्मा अब रोहित तिवारी हो कर उपस्थित हैं । चैनलों पर शहीदाना अंदाज़ में हैं और विजेता भाव में भी। मां उज्जवला भी हैं उन के सुर में सुर मिलाती। अगर नहीं है कोई तो नारायणदत्त तिवारी और बी पी शर्मा नहीं हैं।
      एक जैविक पिता हैं और दूसरे लांछित पिता। नारायणदत्त तिवारी का बयान तो उन के ओ.एस.डी. भट्ट ने पढ कर सुना दिया है। पर बी.पी शर्मा शुरु ही से इस पूरे परिदृश्य से अनुपस्थित हैं। उन की उपस्थिति होती भी तो भला किस तरह होती? क्या वह भी रोहित और उज्जवला के सुर में सुर मिलाते? कहना कुछ नहीं बहुत कठिन् है। अभी तो समूचा मीडिया तिवारी जी पर टूट पड़ा है। रोहित के बचपन से जवान होते जाने की तमाम-तमाम फ़ोटुओं के साथ जिन में तिवारी जी का रोहित के प्रति छलकता उत्साह साफ दिखता है। उज्जवला भी हैं इन फ़ोटुओं में छलकती और इतराती हुई। और अभी भी तिवारी जी का कहना है कि रोहित से उन्हें कोई शिकायत नहीं है।
         तो क्या पुरुष होना इतना बडा़ गुनाह है?
     तिवारी जी अगर इस पूरे मामले में दोषी हैं तो उज्जवला शर्मा क्या दूध की धोई हुई हैं? यह सवाल कोई नहीं कर रहा है। किया जाना चाहिए। मीडिया तिवारी जी को ऐसे कोस रही है गोया वह अपराधी हों। जैसे अमरमणि त्रिपाठी, आनंद सेन या राजस्थान के भंवरी केस के सुराणा की तरह हत्यारे हों। यह ठीक है कि वह नाजायज पिता होने के दोषी हैं। पर अपराधी नहीं हैं। भारतीय कानून की निगाह में वह अपराधी नहीं हैं। उन्हों ने अपने बयान में कहा भी है कि उन की सरलता के चलते उन्हें साज़िश के तहत फंसा दिया गया है। सार्वजनिक जीवन जीने की मर्यादा उन्हों ने खंडित की है। यह तो हम सब पहले ही से जानते रहे हैं। पर उन्हें अपराधी की तरह मीडिया में परोसना शर्मनाक है।
    दिक्कत यह भी है कि जिस लालच में उज्जवला शर्मा और रोहित ने तिवारी जी की टोपी उछाली है सरे आम उस लालच में भी वह कामयाब होते दीखते नहीं हैं। रोहित की तकलीफ़ यह है कि घर में तो तिवारी जी उन्हें बेटा कह कर बुलाते थे पर बाहर निकलते ही टोपी पहन कर वह उन्हें भूल जाते थे। अजीब त्रासदी है यह? इतनी सारी फ़ोटो में तिवारी जी रोहित और उज्जवला के साथ हैं और हर फ़ोटो में रोहित के प्रति उन का वात्सल्य छलकता बार-बार दिखता है। रोहित और क्या चाहते थे? कि वह एक सार्वजनिक जीवन जीते हुए सब को बताते फिरते कि देखो मैं रोहित का नाज़ायज़ पिता हूं और कि इस की मां मेरी रखैल है?
     सच यह है कि जब तक तिवारी जी सत्ता में रहे, सत्ता के फ़ायदे रोहित और उन की मा उज्जवला लूटती रहीं। बाद में जब तिवारी जी उन्हें फ़ायदा देने की स्थिति में नहीं रह गए तब यह मां-बेटे उन्हें भावनात्मक ब्लैकमेल करने लगे। तिवारी जी की संपत्ति के लिए। पर तिवारी जी के पास कोई संपत्ति होती तब न वह उन को देते? अपनी पैतृक संपत्ति तक का तो उन्हों ने ट्रस्ट बना दिया है। वह देते भी तो क्या देते उन्हें? और अभी भी वह क्या पा जाएंगे? दहाड़ तो रहे हैं रोहित कि हर कानूनी हक के लिए वह लड़ेंगे। अब बाकी तो संपत्ति की ही लड़ाई रह गई है न?
     खैर। कल्पना कीजिए कि अगर तिवारी जी भी रोहित और उज्जवला के स्तर की बेशर्मी पर कहीं उतर गए होते तो परिदृष्य कैसा होता भला? लेकिन तिवारी जी तो शुरु ही से विरोधियों का भी सम्मान करने के अभ्यस्त रहे हैं। वह अभी भी रोहित के खिलाफ़ कुछ नहीं कह रहे। बल्कि रोहित के साथ सहानुभूति जता रहे हैं। नहीं जानने को कौन नहीं जानता था कि तिवारी जी रोहित के नाज़ायज़ पिता हैं। बिलकुल शुरु ही से। रोहित ने खुद कहा है कि उन के दफ़्तर के लोग उन्हें बहुत आत्मीयता से खिलाते थे। तो क्या मुफ़्त में? फिर भी वह दुहराते हैं कि घर से बाहर निकलते ही टोपी पहन कर वह उन्हें भूल जाते थे। शशि कपूर द्वारा निर्मित श्याम बेनेगल की एक बहुत महत्वपूर्ण फ़िल्म है कलयुग। महाभारत की ही कथा को आधुनिक परिवेश में उन्हों ने इस फ़िल्म में बुना है। दो उद्योगपति परिवार की कहानी है। गांधारी, कुंती, धृतराष्ट्र, भीष्म पितामह सभी हैं। जिस में कर्ण की भूमिका खुद शशि कपूर ने की है। रेखा द्रौपदी की भूमिका में हैं, कुलभूषण खरबंदा भीम और अनंत नाग अर्जुन वाली भूमिका में। अदभुत फ़िल्म है। जब कर्ण को मारने की बात चलती है तो कुंती डर जाती है। और सभी बेटों को इकट्ठा बैठा कर राय मशविरा करते हुए ऐसा करने से मना करती है। और बताती है कि कर्ण तुम सब का सब से बडा़ भाई है। यह सुनते ही अर्जुन की भूमिका में अनंतनाग जैसे कुंती पर टूट पड़ता है। और लगभग दौडा़ लेता है मारने के लिए। चीखता है, ‘कुलटा कहीं की !बडी़ मुश्किल से राज बब्बर, कुलभूषण वगैरह अनंतनाग को काबू कर पाते हैं।फ़िल्मी ही सही एक दृष्य वह है और एक दृष्य यह है रोहित और उज्जवला का।
      तिवारी जी जैसे विनम्र व्यक्ति के साथ यह हादसा ही है। जो लोग तिवारी जी और उन की विनम्रता को जानते हैं, वह लोग समझ सकते होंगे उन का अंतर्द्वद्व। यहां अभी और बिलकुल अभी एक बार की घटना याद आ रही है। नारायणदत्त तिवारी तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। वोट बैंक के चक्कर में हाइकमान के निर्देश पर उन्हों ने उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा दे दिया था। इस के विरोध में पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी ने लगभग मुहिम सी चला दी थी तब। धरना प्रदर्शन सब किया।
एक बार उन्हों ने लखनऊ में हिंदी संस्थान से जी.पी.ओ. तक जुलूस निकाला। और मुख्यमंत्री को ज्ञापन देने की बात थी। अमूमन होता यही है कि मुख्यमंत्री वगैरह के औपचारिक ज्ञापन आदि ज़िला प्रशासन के अधिकारी या उन से जुडे़ अधिकारी् ही ले कर इतिश्री कर लेते हैं और ज्ञापन वहां तक ज़रुरी समझते हैं तो पहुंचा देते हैं। पर उस बार उपस्थित अधिकारियों को जब ज्ञापन देने की औपचारिक बात की चतुर्वेदी जी ने और पूछा कि ज्ञापन आप ही लोग लेंगे या मुख्यमंत्री जी लेंगे? तो उपस्थित अधिकारियों ने उन से कहा कि, ‘माननीय मुख्यमंत्री जी आप की प्रतीक्षा में हैं।चतुर्वेदी जी पहुंचे मुख्यमंत्री कार्यालय अपने साथियों के साथ। तिवारी जी न सिर्फ़ प्रतीक्षारत थे बल्कि खडे़ हो कर उन्हों ने चतुर्वेदी जी का लगभग स्वागत किया। प्रणाम कहा। और खड़े हो कर ही हाथ जोड़ कर ही उन से ज्ञापन लिया। चतुर्वेदी जी बहुत गुस्से में थे, तिवारी जी की इस विनम्रता ने उन का सारा गुस्सा पी लिया था। वह मुसकुराते हुए लौटे थे। बाद के दिनों में तिवारी जी से मैं ने पूछा कि, ‘अगर आप उन से सहमत थे, उन की मांगों को इस तरह स्वीकार कर रहे थे मान लेने में भी क्या हर्ज़ था?’ तिवारी जी ने कहा कि, ‘शासन और राजनीति की अपनी ज़रुरतें होती हैं पर इस सब के बावजूद, विरोध के बावजूद हम किसी को सम्मान तो दे ही सकते हैं, देना ही चाहिए। और फिर चतुर्वेदी जी विद्वान व्यक्ति हैं बुजुर्ग हैं, सम्मान का हक बनता है उन का।ऐसे ही एक बार संस्कृत अकादमी की ओर से सम्मान समारोह आयोजित था। राजभवन में। अध्यक्षता राज्यपाल कर रहे थे। सम्मन तिवारी जी दे रहे थे। मैं ने देखा कि किसी भी विद्वान को उन्हों ने मंच पर नहीं आने दिया। खुद दौड़-दौड़ कर सभी विद्वानों के पास वह पहुंचे और कि सब को सम्मानित किया। अपने भाषण में भी वह विनम्र हुए। और कहा कि वेद्पाठी पंडितों को ढाई हज़ार रुपए सम्मान राशि बहुत कम है। अब वेदपाठी पंडित मिलते कहां हैं? उन्हों ने सम्मान राशि बढा़ कर तुरंत दस हज़ार कर दी और कहा कि अभी तो चेक बन गया है पर बची राशि भी विद्वानों के घर पहुंच जाएगी। 
       आज कल तो राजनेताओं से सरकारी या कोई अन्य सम्मान लेना भी लगभग अपमान हो गया है। वह ऐसे हिकारत से पेश आते हैं विद्वानों से कि जैसे कोई बहुत निकृष्ट काम कर रहे हों। अव्वल तो अब राजनेता ऐसे सम्मान समारोहों से कतराने लगे हैं। जैसे कि उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का पुरस्कार कभी मुख्यमंत्री ही आते थे देने। पर मायावती कभी नहीं आईं ऐसे किसी समारोह में। किसी मंत्री को अपना प्रतिनिधि बना कर भेज देती थीं। मुलायम भी पिछले कार्यकाल में नहीं आते थे। और अब तो मायावती ने जाते-जाते दो-तीन पुरस्कार छोड़ कर सब रद्द कर दिए थे। अखिलेश सरकार ने उसे अभी तक बहाल नहीं किया है।
     एक समय यह पुरस्कार प्रधानमंत्री देने आते थे। एक बार मोरार जी देसाई आए थे। आचार्य किशोरीदास वाजपेयी को भारत-भारती सम्मान मिलना था। उन का नाम पुकारा गया पर वह मंच पर नहीं पहुंचे। दो बार, तीन बार पुकारा गया। वह नहीं गए। मोरार जी ने आयोजकों से खिन्न हो कर पूछा कि वह आए भी हैं? उन्हें बताया गया कि आए हुए हैं और वह सामने की लाइन में बैठे हुए हैं। मोरार जी समझ गए। वह मंच से खुद उतर कर वाजपेयी जी के पास पहुंचे और उन्हें सम्मानित किया। रघुवीर सहाय ने तब दिनमान में इस विषय पर संपादकीय लिखी थी और बताया था कि यह पहली बार है कि सम्मान पाने वाले का चेहरा फ़ोटो में दिखा। नहीं अमूमन सम्मान देने वाले का चेहरा दिखता है।
क्षमा करें ज़रा विषयांतर हो गया।
      पर क्या यह सम्मान समाज में किसी लेखक या किसी भी व्यक्ति का इस तरह रह गया है क्या? तिवारी जी का जो हाल मीडिया ने बीते कुछ वर्षों से बना रखा है, इस पितृत्व विवाद के चलते, लगता है जैसे वह कभी विकास पुरुष नहीं रहे, गिरहकट या लुच्चे हों। यह बहुत शर्मनाक है। किसी की निजी ज़िंदगी में मीडिया का इस तरह घुसपैठ किसी भी सूरत में ठीक नहीं है। पिता एक सम्मानित संस्था है उस को इस तरह लांछित करना किसी भी सभ्य समाज के लिए उचित नहीं है। पिता शब्द की गरिमा को बनाए रखना ज़रुरी भी है। तिवारी जी रोहित के पिता थे, यह रोहित और उज्ज्वला ही नहीं बहुतेरे लोग वर्षों से जानते थे। डी.एन.ए.टेस्ट ने अब उस पर एक मुहर लगा दी है। उन फ़ोटुओं को एक बार फिर से निहारिए जिस में रोहित के प्रति तिवारी जी का प्यार उन का वात्सल्य छ्लक रहा है। अनेक फ़ोटो इस की गवाह हैं। अगर सिर्फ़ ऐयाशी ही की ही भावना रही होती तो वह तमाम पुरुषों की तरह कतरा गए होते। और कम से कम साल दर साल हर जन्म-दिन पर फ़ोटो तो नहीं ही खिंचवाते। गलती उन से हुई है, सार्वजनिक जीवन जीने की मर्यादा उन्हों ने लांघी है पर इस बिना पर उन के पितृत्व को इस तरह चौराहे पर खडा़ कर लांछित तो मत कीजिए। सुन रही हैं उज्जवला जी, रोहित जी और मीडिया की दुकानें? और फिर बिचारे बी.पी शर्मा को भी समाज में मुंह दिखाने भर के लिए जीने का हक देंगे कि नहीं?
      क्या पुरुष होना इतना बडा़ गुनाह है? कि औरत के सारे गुनाह माफ़ और पुरुष को फांसी ! 
      यह ठीक है कि पिता घोषित हो कर तिवारी जी हार गए हैं। बालेश्वर एक गाना गाते थे कि, ‘जे केहू से नाईं हारल/ ते हारि गइल अपने से !तो तिवारी जी अपनों से हार गए हैं। और जो इसी बात को इस तरह भी देखना चाहें तो देख सकते हैं, कि बेटे से हार कर भी अंतत: पिता की ही जीत होती है। पिता के लिए इस से बडा़ सुख कोई और होता नहीं कि वह अपने ही जाए से हार जाए।      

लेखक के बारे में

दयानंद पांडेय न सिर्फ वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. 
अगर आप उन्हें पढेंगे उन्हें जानेंगे तो पाएंगे कि 
वो समकालीन पत्रकारिता के लिए एक पूरी संस्था हैं
दयानंद से संपर्क 
09415130127, 09335233424 
और dayanand.pandey@yahoo.com 
के जरिए किया जा सकता है

10 टिप्‍पणियां:

  1. दयानंद पाण्डेय जी को जानना चाहिए की ये सूर्य पुत्र कर्ण का मामला नहीं है और नारायण दत्त तिवारी कोई सूर्य नहीं हैं ये तो सही है की उज्जवला कोई भली स्त्री नहीं कही जाएँगी किन्तु इससे तिवारी जी का कृत्या पुण्यों की श्रेणी में नहीं आता क्योंकि ये तो सभी जानते हैं की ''चन्दन विष व्यापत नहीं लिप्तत रहे भुजंग.''और रोहित को जो भुगतना पड़ा है वह उनके आलावा कोई बयाँ नहीं कर सकता.इतनी सी उम्र में उन्हें हार्ट अटैक और लकवा झेलना पड़ा बहुत दुखद है.सच है भगवन के घर देर है अंधेर नहीं है. रफ़्तार जिंदगी में सदा चलके पायेंगें
    मोहपाश को छोड़ सही रास्ता दिखाएँ

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  3. शुक्र है लोकतंत्र का एक खंभा न्याय-पालिका मजबूती से खड़ा है वरना सबके मन मे आशंका थी की सरकार के दबाव मे आकर डी एन ए रिपोर्ट दबा दी जाएगी , सच को सामने लाने के लिए रोहित शेखर को बधाई ,,,,,,,,,,,,,,शेखर और उनकी माँ उज्ज्वला किस मानसिक यातना से गुज़री होंगी इसका अनुमान लगाना काफ़ी कठिन है.,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
    धीरे-धीरे हमारे नेताओं का चरित्र सामने आ रहा हैं , ऐसे न जाने कितने रोहित और होंगे जो सामने नहीं आ सकते या उनको मार दिया गया होगा ..............एन डी तिवारी जी को उनके नाजायज बच्चे पैदा करने या अय्याशी की सज़ा नही बल्कि सच जानते हुए देश की जनता को गुमराह करने तथा लगातार झूठ बोल के कोर्ट और एक भारतीय युवा का समय ख़राब करने के लिए कोर्ट को नारायणदत्त तिवारी को सज़ा देनी चाहिए.

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  4. बहुत ख़ूब!
    आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 30-07-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-956 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  6. तिवारी जी अगर इस पूरे मामले में दोषी हैं तो उज्जवला शर्मा क्या दूध की धोई हुई हैं?
    यह सवाल कोई नहीं कर रहा है।

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