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शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

"सियासत ख़ानदानों में" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


नहीं मिलता यहाँ पर, अब हुनर तालीमख़ानों में।
पढ़ाई बिक रही अब तो, धड़ल्ले से दुकानों में।।

कहें हम दास्तां किससे, सुनेगा कौन जनता की?
दबी आवाज तूती की, यहाँ नक्कारखानों में।

मिलेगा किस तरह पानी, फसल कैसे उगेगी अब?
जमी हैं मैल की पर्तें,  नदी के सब मुहानों में।

यहाँ कच्चे घरों का ख्याल, बोलो कौन रक्खेगा?
हुआ जब कैद हो मालिक, गगनचुम्बी मकानों में।

हमारी सल्तनत में अबथिरकती मौत है हरदम,
नहीं महफूज है कोई, बने पुख़्ता ठिकानों में।

शुरू से ही जमीं के वास्ते, ये जंग होती हैं,
चले अब शूरमा लड़ने, लड़ाई आसमानों में।

मगर को देखकर, डर से दिये हैं वोट मीनों ने,
डकैतों ने लिखाया नाम, अपना कद्रदानों में।

पढ़े लिक्खों के सिर पर, कौन अब दस्तार बाँधेगा?
सियासत जब सिमट कर, रह गयी हो ख़ानदानों में।

22 टिप्‍पणियां:

  1. कड़वी सच्चाई का बेहतरीन खाका...
    सादर !

    उत्तर देंहटाएं
  2. शास्त्री जी उम्दा अभिव्यक्ति
    हृदय के हर कोने को झिजोड कर रखदिया है इन पंक्तियों ने
    हमारी सल्तनत में अब, थिरकती मौत है हरदम,
    नहीं महफूज है कोई, बने पुख़्ता ठिकानों में।

    शुरू से ही जमीं के वास्ते, ये जंग होती हैं,
    चले अब शूरमा लड़ने, लड़ाई आसमानों में।

    मगर को देखकर, डर से दिये हैं वोट मीनों ने,
    डकैतों ने लिखाया नाम, अपना कद्रदानों में।

    उत्तर देंहटाएं
  3. कुनैन की तरह...
    कविता की मिठास में लपेट कर सच्चाई की कडवी गोली... :)

    उत्तर देंहटाएं
  4. पढ़े लिक्खों के सिर पर, कौन अब दस्तार बाँधेगा?
    सियासत जब सिमट कर, रह गयी हो ख़ानदानों में।

    Bahut khoob !

    उत्तर देंहटाएं
  5. सच्चाई को प्रस्तुत करती सुन्दर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  6. हकीकत बयां करती उत्कृष्ठ रचना.
    बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  7. शुरू से ही जमीं के वास्ते, ये जंग होती हैं,
    चले अब शूरमा लड़ने, लड़ाई आसमानों में।

    मगर को देखकर, डर से दिये हैं वोट मीनों ने,
    डकैतों ने लिखाया नाम, अपना कद्रदानों में।
    बेहद खूबसूरत , आभार .
    सादर

    ऐसे नबंरो पर कॉल ना करे. पढ़ें और शेयर

    उत्तर देंहटाएं
  8. हकीकत बयां करती सटीक प्रस्तुति..

    उत्तर देंहटाएं
  9. मगर को देखकर, डर से दिये हैं वोट मीनों ने,
    डकैतों ने लिखा
    या नाम, अपना कद्रदानों में।
    बहुत बढ़िया प्रस्तुति शिखर पर पहुँच रही है व्यंजना .

    उत्तर देंहटाएं
  10. पढ़े लिक्खों के सिर पर, कौन अब दस्तार बाँधेगा?
    सियासत जब सिमट कर, रह गयी हो ख़ानदानों में।

    ....बहुत सटीक प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं
  11. पढ़े लिक्खों के सिर पर, कौन अब दस्तार बाँधेगा?
    सियासत जब सिमट कर, रह गयी हो ख़ानदानों में।

    वाह !

    उत्तर देंहटाएं
  12. यहाँ कच्चे घरों का ख्याल, बोलो कौन रक्खेगा?
    हुआ जब कैद हो मालिक, गगनचुम्बी मकानों में।

    क्या बात है !!
    बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल है जनाब !!

    उत्तर देंहटाएं

  13. पढ़े लिक्खों के सिर पर, कौन अब दस्तार बाँधेगा?
    सियासत जब सिमट कर, रह गयी हो ख़ानदानों में।

    वाह बहुत खूब !!

    उत्तर देंहटाएं
  14. Yahaan Mayassar Nahin Hunar Taalimkhaanon Men..,
    Taalimaat Bik Rahin Ab Dhadhadhalle Se Dukaanon Men..,

    Ye Daastaan Ek Mulk Ki Kaoum Ki Fariyaad Hai..,
    Ye Aavaaj Nafir Ki Vo Shor Nakkaarkhaanon Men.....

    उत्तर देंहटाएं
  15. Tharatharaati Mout Hai Haradam..,

    Baraaye Aagaaj Jamin Par Hi Anjaame Jang Hoti Hai..,
    Jihaadi Suramaa Ye Jangju Karenge Jang Aasamaanon Men.....

    उत्तर देंहटाएं
  16. Jab Hayaat Hi Nahin Haasil, Fasale Fajal Ho Kaese..,
    Jami Hai Varke Jamjam, Rudaadi Haasiyaanon Men.....

    उत्तर देंहटाएं
  17. Yahaan Faanusi aashiyaane Ka Koun Rahamto Ranumaa..,
    Kaed Jab Ho Rahabar Minaaron Shaah Makaanon Men.....

    उत्तर देंहटाएं
  18. क्या खूब कहा आपने वहा वहा बहुत सुंदर !! क्या शब्द दिए है आपकी उम्दा प्रस्तुती
    मेरी नई रचना
    प्रेमविरह
    एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ

    उत्तर देंहटाएं

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