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शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

"उमड़-घुमड़कर छाये बादल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आखिर क्या बात है इस रचना में?
17 जून,2009 को यह रचना लिखी थी।
मगर आज तक यह मेरी लोकप्रिय पोस्ट में
नम्बर-1 पर चल रही है।
आपके अवलोकनार्थ इसे पुनः प्रकाशित कर रहा हूँ।
श्वेत-श्याम से नजर आ रहे मेघों के दल।
आसमान में उमड़-घुमड़कर, छाये बादल।।
कही छाँव है कहीं घूप है,
इन्द्रधनुष कितना अनूप है,
मनभावन रंग-रूप बदलता जाता पल-पल।
आसमान में उमड़-घुमड़कर छाये बादल।।
मम्मी भीगी , मुन्नी भीगी
दीदी जी की चुन्नी भीगी,
मोटी बून्दें बरसाती, निर्मल-पावन जल।
आसमान में उमड़-घुमड़ कर छाये बादल।।
हरी-हरी उग गई घास है
धरती की बुझ गई प्यास है,
नदियाँ-नाले नाद सुनाते जाते कल-कल।
आसमान में उमड़-घुमड़ कर छाये बादल।।
बिजली नभ में चमक रही है
अपनी धुन में दमक रही है,
वर्षा ऋतु में कृषक चलाते खेतो में हल।
आसमान में उमड़-घुमड़ कर छाये बादल।।
(चित्र गूगल छवियों से साभार)

13 टिप्‍पणियां:

  1. मूर्त रूप है यह रचना भावों का .भावों के आलोडन के अनुरूप चित्र हैं जो एक चल चित्र से रचना का फिल्मांकन करते चलतें हैं .हम भी विमुग्ध हैं आपकी इस मल्टी -टास्किंग पर .

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत प्यारी सी रचना.....

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सार्थक प्यारी प्रस्तुति,,,,

    RECENT POST...: दोहे,,,,

    उत्तर देंहटाएं
  4. कविता के साथ चित्र भी बहुत खूबसूरत हैं .

    उत्तर देंहटाएं
  5. aaj to humne aapke ghar aa kar dekh bhee liye ye kaale baadal....mil kar bahut acha lagaa.

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत ही सुन्दर मनमोहक चित्रों के साथ सुन्दर प्रस्तुति ..

    उत्तर देंहटाएं
  7. जैसे चित्र वैसी कविता !!
    वाह !!

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत ही सुंदर कविता है। समय मिले आपको तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है।

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत सुन्दर मनभावन रचना...
    :-)

    उत्तर देंहटाएं

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