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गुरुवार, 26 जुलाई 2012

"उल्लुओं सी सोच मत रक्खा करो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
हौसले के साथ में आगे बढ़ो
फासले इतने न अब पैदा करो।

जिन्दगी तो है हकीकत पर टिकी,
मत इसे जज्बात में रौंदा करो।

चाँद-तारों से भरी इस रात में,
उल्लुओं सी सोच मत रक्खा करो।

बुलबुलों से ज़िन्दगी की सीख लो,
राग अंधियारों का मत छेड़ा करो।

उलझनों का नाम ही है जिन्दगी,
हारकर, थककर न यूँ बैठा करो।

छोड़कर शिकवें-गिलों की बात को,
मुल्क पर जानो-जिगर शैदा करो।

खूबसूरत दिल सजा हर जिस्म में,
 “रूप पर इतना न मत ऎंठा करो।

13 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन गज़ल बिंदास अंदाज़ लिए बोलते हुए तमाम अशआर .

    उत्तर देंहटाएं
  2. जबरदस्त झिडकी, सलाह और उपदेश |
    आभार गुरु जी ||

    उत्तर देंहटाएं
  3. कल 27/07/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  4. चित्र में उल्लू नहीं हैं, बुलबुलों का जोड़ा है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. उलझनों का नाम ही है जिन्दगी,
    हारकर, थककर न यूँ बैठा करो

    बहुत सुन्दर गजल ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. वाह, क्या बात कही है, बहुत ही सुन्दर..

    उत्तर देंहटाएं
  7. उलझनों का नाम ही है जिन्दगी,
    हारकर, थककर न यूँ बैठा करो।

    :)

    उत्तर देंहटाएं
  8. Faisala hone se pahle main kyu haar manu.
    Jag abhi jeeta nahi hai, Main abhi hara nahi hun.

    उत्तर देंहटाएं

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