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गुरुवार, 19 जुलाई 2012

"समाजवाद का चेहरा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


समाजवाद से-
कौन है अंजाना?
समाजवाद का चेहरा है,
जाना-पहचाना?
--
डाका, राहजनी, और चोरी,
सुरसा के मुँह के समान-
बढ़ रही है,रिश्वतखोरी।
देख रहे हैं-
गरीब और मजदूर,
होता जा रहा है,
चिकित्सा और न्याय-
उनसे दूर।
--
बढ़ता जा रहा है-
भ्रष्टाचार, व्यभिचार और शोषण,
नेतागण कर रहे हैं-
अपने परिवार का पोषण।
--
क्या समाजवाद-
सबके हित की-आवाज है?
क्या देश में दीन-दुखी,
आम आदमी का राज है?
पछता रहे हैं,
गरीब और कमजोर, 
क्यों भेजा था उन्होंने संसद में-
एक निकम्मा-कामचोर?
--
आज केवल-
नेता ही आबाद है,
जनता 
आज भी बरबाद है।
क्या यही समाजवाद है?
हाँ यही समाजवाद है।

16 टिप्‍पणियां:

  1. सनी कहा..आज केवल-
    नेता ही आबाद है,

    उत्तर देंहटाएं
  2. ...ये लाल टोपी समाजवाद का प्रतिक नहीं है!...शायद साम्यवाद का प्रतिक है!

    उत्तर देंहटाएं
  3. उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

    आइये पाठक गण स्वागत है ।।

    लिंक किये गए किसी भी पोस्ट की समालोचना लिखिए ।

    यह समालोचना सम्बंधित पोस्ट की लिंक पर लगा दी जाएगी 11 AM पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  4. हाँ यही समाजवाद है।-SATEEK KATAKSH .BADHAI

    उत्तर देंहटाएं
  5. हाँ यही समाजवाद है।-SATEEK KATAKSH .BADHAI

    उत्तर देंहटाएं
  6. बापू तुम्हारी लाठी की कसम समाजवाद को घसीट घसीट के ला रहें हैं ,

    और तुम्हारे लंगोट की कसम माल खुद खा रहें हैं ,

    इसीलिए रोज़ तिहाड़ जा रहें हैं ,

    और तुम्हारी कसम बापू अगला चुनाव ,

    तिहाड़ से ही लड़ेंगे .

    उत्तर देंहटाएं
  7. badhayee dene ke liue shukariya sir ,samajwad parrachana swabhavik ban padi hailekin aaj har taraf vaad-hi vaad hai.jovivad m badal chuka hai.

    उत्तर देंहटाएं
  8. अब कोई कया करे लोकतंत्र की अपनी सीमाएं भी हैं

    उत्तर देंहटाएं
  9. समाजवाद तो मात्र मंचों की भाषा है .......इन अवसरवादियों का रास्ता ही भय ,भूख और लालच से बनता है ,....इतिहास गवाह है / तोडा ,जोड़ा और मरोड़ा ... समाजवाद शायद डॉ. लोहिया के साथ ही तिरोहित हो गया ..../

    उत्तर देंहटाएं
  10. कोई भी वाद
    किताबी परिभाषा
    हो जाता है
    बस भाषण देने
    के वो एक
    काम आता है
    बाकी हाथी के
    दिखाने के दांत
    हो जाता है!!!

    उत्तर देंहटाएं
  11. बस हल्की नील चढाकर के, मै कुर्सी को पा लेता हूँ
    तू खाना खा कर जीवित है, मै जनमत खाकर ज़िंदा हूँ,,,,,

    उत्तर देंहटाएं

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