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गुरुवार, 5 जुलाई 2012

"रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई।

शीतल पवन चली सुखदायी।
रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई। 

भीग रहे हैं पेड़ों के तन,
भीग रहे हैं आँगन उपवन,
हरियाली सबके मन भाई।
रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई।।

मेंढक टर्र-टर्र चिल्लाते,
झींगुर मस्ती में हैं गाते,
आमों की बहार ले आई।
रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई।।

आसमान में बिजली कड़की,
डर से सहमें लडका-लड़की,
बन्दर जी की शामत आई।
रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई।।
 
कहीं छाँव है, कहीं धूप है, 
इन्द्रधनुष कितना अनूप है,
धरती ने है प्यास बुझाई।
रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई।।
 
विद्यालय भी तो जाना है,
होम-वर्क भी जँचवाना है,
प्राची छाता लेकर आयी।
रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई।।

16 टिप्‍पणियां:

  1. वर्षा का तो अभी भरोसा नही लेकिन आपकी कविता से ही मन भीग गया है। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  2. अब तो वर्षा आही गई..रिम झिम का शोर मचाते..

    उत्तर देंहटाएं
  3. सावन आ गया अब तो बरसो,,,,,,,
    बहुत उम्दा अभिव्यक्ति,,,सुंदर रचना,,,,

    MY RECENT POST...:चाय....

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर रिमझिम करती हुई कविता ने मन मोह लिया

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुंदर रचना ...
    शुभकामनायें.

    उत्तर देंहटाएं
  6. यह है शुक्रवार की खबर ।

    उत्कृष्ट प्रस्तुति चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत बढ़िया बाल गीत .पुरबा मीठे राग सुनाई ,कलि कलि देखो मुस्काई ,...,कोयल मीठे तान सुनाई ...,यहाँ नहीं कोई हरजाई ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. ji haan aaj varsha yahan bhi aa hi gayi...jara rooth k jara nakhre se lekin sabka man bhigo gayi

    varsha sa sunder apka geet.

    उत्तर देंहटाएं

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