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मंगलवार, 24 जुलाई 2012

"धोखा मिला चाँदनी रात में" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी पुरानी डायरी से एक ग़ज़ल
 
मन हुआ अनमना बात ही बात में।
खो गया मैं कहाँ जाने ज़ज्बात में।।

दिल की दौलत लुटाई बड़े चाव से,
उसने लूटा खजाना मुलाकात में।

जाल पर जाल वो फेंकते ही गये,
कितना जादू था उनके ख़यालात में।

देर से ही सही सच उजागर हुआ,
सिर्फ छल-छद्म था उनकी सौगात में।

रूप पर उनके दिल था दिवाना हुआ,
मुझको धोखा मिला चाँदनी रात में।

12 टिप्‍पणियां:

  1. देर से ही सही सच उजागर हुआ,
    सिर्फ छल-छद्म था उनकी सौगात में।
    रूमानियत लिए है ये रचना गुजिस्ता दिनों की .बढ़िया प्रस्तुति .

    उत्तर देंहटाएं
  2. बड़े नाज़ुक टाइम में धोखा मिला है।
    उम्दा काव्य .

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया ग़ज़ल दाद कबूल कीजिये

    उत्तर देंहटाएं
  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. रूप देख दीवाना हुआ, फिसला मेरा दिल
      जाते जाते थम्हा गई, हजारों का ये बिल,,,,,,,

      बहुत बढ़िया प्रस्तुती, सुंदर गजल ,,,,,

      RECENT POST काव्यान्जलि ...: आदर्शवादी नेता,

      हटाएं
  5. “रूप” पर उनके दिल था दिवाना हुआ,
    मुझको धोखा मिला चाँदनी रात में।

    ''रूप'' का सुन्दर प्रयोग. चाँदनी रात में ही तो दिल धोखा खाता है. सुन्दर गज़ल, बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  6. अद्भुत रचना, कई बार पढ़ने का मन किया..

    उत्तर देंहटाएं
  7. जाल पर जाल वो फेंकते ही गये,
    कितना जादू था उनके ख़यालात में।

    देर से ही सही सच उजागर हुआ,
    सिर्फ छल-छद्म था उनकी सौगात में।
    बहुत सुन्दर !

    उत्तर देंहटाएं
  8. “रूप” पर उनके दिल था दिवाना हुआ,
    मुझको धोखा मिला चाँदनी रात में।
    bahut sundar..

    उत्तर देंहटाएं

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