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शनिवार, 7 जुलाई 2012

"दोहा पच्चीसी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

(१)
"चिड़िया बैठी गा रही, करती यही पुकार।
सदा महकता ही रहे, जीवन का संसार।।"
(२)
"गेहूँ की है दुर्दशा, महँगाई की मार।
देख रही है शान से, भारत की सरकार।।"
(३)
"धरती प्यासी थी बहुत, जन-जीवन बेहाल।
धान लगाने के लिए, लालायित गोपाल।।"
(४)
"माँगा पानी जब कभी, लपटें आयीं पास।
जलते होठों की यहाँ, कौन बुझाये प्यास।।
(५)
"बात-बात में हो रही, आपस में तकरार।
प्यार-प्रीत की राह में, आया है व्यापार।।"
(६)
"उमड़-घुमड़कर आ रहे, अब नभ में घनश्याम।
दुनिया को मिलने लगा, गर्मी से आराम।।"
(७)
झुकी पत्तियाँ पेड़ की, करती है प्रणाम।
बरसो बारिस जोर से, मिलता है आराम।।
(८)
"धरा-गगन में हो रहा, उत्सव का माहौल।
चपला देती रौशनी, बादल बोले बोल।।"
(९)
"बैठा जीवन शाख पे, पाखी गाता गीत।
बीते युग को याद कर, बजा रहा संगीत।।"
(१०)
"बीज उगा जब धरा में, शुरू हो गया चक्र।
लेकिन मानव कर रहा, अपनी भौहें वक्र।।"
(११)
"नेह हमारा साथ है, ईश्वर पर विश्वास।
अन्धकार को चीर के, फैले धवल उजास।।"
(१२)
"सावन आया झूमकर, बम-भोले का नाद।
चौमासे में मनुज तू, शंकर को कर याद।।"
(१३)
"कदम-कदम पर सुलगते, जीवन में अंगार।
अश्कों से कैसे बुझें, ज्वाला के अम्बार।।
(१४)
उल्लू को भाता नहीं, दिन का प्यारा साथ।
अंधकार को खोजता, सदा मनाता रात।।"
(१५)
"तेला जी ने रच दिये, हास्य-व्यंग्य के रंग।
अपने भारत देश के, बिगड़ गये हैं ढंग।।"
(१६)
"सहज योग की प्रेरणा, करती है कुलश्रेष्ठ।
आओ जन्म सुधार लें, सीख सिखाते ज्येष्ठ।।"
(१७)
"दौलत पाने के लिए, तान रहे बन्दूक।
जीवित माता-पिता का, लूट रहे सन्दूक।।"
(१८)
"अपने झण्डे के लिए, डण्डे रहे सँभाल।
जनमानस को ठग रहे, भरते घर में माल।।"
(१९)
"राजनीति की बिछ रहीं, चारों ओर बिसात।
आम आदमी पर पड़ी, केवल शह और मात।।"
(२०)
"नौका लहरों में फँसी, बेबस खेवनहार।
ऐसा नाविक चाहिए, जो ले जाये पार।।"
(२१)
"काली छतरी ओढ़ के, आते गोरे लोग।
बारिश में करते सभी, छाते का उपयोग।।"
(२२)
"सपन सलोने नैन में, आते हैं दिन-रात।
लेकिन सच होती नहीं, इन सपनों की बात।।"
(२३)
"सूरज आया गगन में, फैला धवल प्रकाश।
मूरख दीपक हाथ ले, खोज रहा उजियास।।
(२४)
"कब तक बीनेगा इसे, पूरी काली दाल।
बैठा है जिस शाख पे, काट रहा वो डाल।।"
(२५)
"महँगाई की मार से, जन-जीवन है त्रस्त।
निर्धन, श्रमिक-किसान के, हुए हौसले पस्त।।"

17 टिप्‍पणियां:

  1. यथार्थ उजागर करती रचना...
    सभी दोहे बहुत शानदार है...
    और जीवन की सच्चाई है.
    शानदार पोस्ट....
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  2. शानदार सार्थक दोहे....आभार शास्त्री जी...

    उत्तर देंहटाएं
  3. क्या बात
    सार्थक संदेश देते दोहे
    बहुत बढिया

    उत्तर देंहटाएं
  4. दोहे चर्चा मंच से, चोरी हुवे पचीस ।

    दर्ज करता हूँ रपट, दोहे बड़े नफीस ।

    दोहे बड़े नफीस, यहाँ न फीस दे गया ।

    शामिल धीर-सुशील, छोड़ते हैं शरम - हया ।

    रविकर करे अपील, मिले दोहा पच्चीसी ।

    मत दे देना ढील, काढ़ कर पढ़िए खीसी ।।

    उत्तर देंहटाएं
  5. लाठी तो चलती रहे, पर आवाज न आय,
    मंहगाई की मार से, जनता मरती जाय!
    जनता मरती जाय, होय काला बाजारी,
    रोते रहे किसान,देखो हँस रहे ब्यापारी!
    नेता व्यापारी, के कारण मंहगाई आती
    होय तभी सुधार, लेय जब जनता लाठी,

    उत्तर देंहटाएं
  6. झुकी पत्तियाँ पेड़ की, करती है प्रणाम।
    बरसो बारिस जोर से, मिलता है आराम।।

    बढ़िया दोहे ...आभार आपका !

    उत्तर देंहटाएं
  7. निशा जी नमस्कार!
    कृपया अब उच्चारण को देखकर बताइए कि कमेंट पास हो रहे हैं या नहीं।
    आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  8. गागर में सागर भरे, दो छंदों के दोहे !
    गद्द पद्द सोना चांदी हैं, दोहे कडवे लोहे !!
    "Dips"

    उत्तर देंहटाएं
  9. एक से एक श्रेष्‍ठ दोहे। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  10. दोहे लिख कर आपने कह दी सच्ची बात।
    ऐसे ही रचते रहें दिन हो चाहे रात।

    उत्तर देंहटाएं
  11. कदम-कदम पर सुलगते, जीवन में अंगार।
    अश्कों से कैसे बुझें, ज्वाला के अम्बार।।
    (१४)
    “उल्लू को भात नहीं, दिन का प्यारा साथ।
    अंधकार को खोजता, सदा मनाता रात।।"

    सभी दोहे लाजवाब ………शानदार

    उत्तर देंहटाएं

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