"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

मंगलवार, 31 जुलाई 2012

"सावन का महीना, पानी नदारत है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सावन का महीना
बादलों की
आँख-मिचौली
और
पानी नदारत है,
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-
चारों ओर
सूखा और सिर्फ सूखा
प्यासे हैं बाग, तड़ाग,
व्यर्थ हो गई
सब प्रार्थना
और
इबादत हैं
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-
खेतों में
उड़ रही है धूल
चमन में
मुरझा रहे हैं फूल
क्या
आने वाली
कयामत है?
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-

सोमवार, 30 जुलाई 2012

"उलट-पलटकर देख ज़रा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


हर सिक्के के दो पहलू हैं, उलट-पलटकर देख ज़रा।
बिन परखे क्या पता चलेगा, किसमें कितना खोट भरा।।

हर पत्थर हीरा बन जाता, जब किस्मत नायाब हो,
मोती-माणिक पत्थर लगता, उतर गई जब आब हो,
इम्तिहान में पास हुआ वो, तपकर जिसका तन निखरा।
बिन परखे क्या पता चलेगा, किसमें कितना खोट भरा।।

नंगे हैं अपने हमाम में, नागर हों या बनचारी,
कपड़े ढकते ऐब सभी के, चाहे नर हों या नारी,
पोल-ढोल की खुल जाती तो, आता साफ नज़र चेहरा।
बिन परखे क्या पता चलेगा, किसमें कितना खोट भरा।।

गर्मी की ऋतु में सूखी थी, पेड़ों-पौधों की डाली,
बारिश के मौसम में, छा जाती झाड़ी में हरियाली,
पानी भरा हुआ गड्ढा भी, लगता सागर सा गहरा।
बिन परखे क्या पता चलेगा, किसमें कितना खोट भरा।।

रविवार, 29 जुलाई 2012

"जैविक पिता और लांछित पिता की त्रासदी" (दयानन्द पाण्डेय)

जैविक पिता और लांछित पिता की त्रासदी (दयानन्द पाण्डेय)
      सोचिए कि कर्ण को जब पता चला होगा कि सूर्य उस के नाज़ायज़ पिता हैं तो क्या कर्ण ने भी कभी मांग की होगी सूर्य से कि अपनी रोशनी और अपनी आग मुझे भी दे दो नहीं मैं तुम्हें बदनाम कर दूंगा? खैर, नारायणदत्त तिवारी अब रोहित शेखर के प्रमाणित पिता हो गए हैं। डी.एन.ए. रिपोर्ट का खुलासा हो गया है। रोहित शर्मा अब रोहित तिवारी हो कर उपस्थित हैं । चैनलों पर शहीदाना अंदाज़ में हैं और विजेता भाव में भी। मां उज्जवला भी हैं उन के सुर में सुर मिलाती। अगर नहीं है कोई तो नारायणदत्त तिवारी और बी पी शर्मा नहीं हैं।
      एक जैविक पिता हैं और दूसरे लांछित पिता। नारायणदत्त तिवारी का बयान तो उन के ओ.एस.डी. भट्ट ने पढ कर सुना दिया है। पर बी.पी शर्मा शुरु ही से इस पूरे परिदृश्य से अनुपस्थित हैं। उन की उपस्थिति होती भी तो भला किस तरह होती? क्या वह भी रोहित और उज्जवला के सुर में सुर मिलाते? कहना कुछ नहीं बहुत कठिन् है। अभी तो समूचा मीडिया तिवारी जी पर टूट पड़ा है। रोहित के बचपन से जवान होते जाने की तमाम-तमाम फ़ोटुओं के साथ जिन में तिवारी जी का रोहित के प्रति छलकता उत्साह साफ दिखता है। उज्जवला भी हैं इन फ़ोटुओं में छलकती और इतराती हुई। और अभी भी तिवारी जी का कहना है कि रोहित से उन्हें कोई शिकायत नहीं है।
         तो क्या पुरुष होना इतना बडा़ गुनाह है?
     तिवारी जी अगर इस पूरे मामले में दोषी हैं तो उज्जवला शर्मा क्या दूध की धोई हुई हैं? यह सवाल कोई नहीं कर रहा है। किया जाना चाहिए। मीडिया तिवारी जी को ऐसे कोस रही है गोया वह अपराधी हों। जैसे अमरमणि त्रिपाठी, आनंद सेन या राजस्थान के भंवरी केस के सुराणा की तरह हत्यारे हों। यह ठीक है कि वह नाजायज पिता होने के दोषी हैं। पर अपराधी नहीं हैं। भारतीय कानून की निगाह में वह अपराधी नहीं हैं। उन्हों ने अपने बयान में कहा भी है कि उन की सरलता के चलते उन्हें साज़िश के तहत फंसा दिया गया है। सार्वजनिक जीवन जीने की मर्यादा उन्हों ने खंडित की है। यह तो हम सब पहले ही से जानते रहे हैं। पर उन्हें अपराधी की तरह मीडिया में परोसना शर्मनाक है।
    दिक्कत यह भी है कि जिस लालच में उज्जवला शर्मा और रोहित ने तिवारी जी की टोपी उछाली है सरे आम उस लालच में भी वह कामयाब होते दीखते नहीं हैं। रोहित की तकलीफ़ यह है कि घर में तो तिवारी जी उन्हें बेटा कह कर बुलाते थे पर बाहर निकलते ही टोपी पहन कर वह उन्हें भूल जाते थे। अजीब त्रासदी है यह? इतनी सारी फ़ोटो में तिवारी जी रोहित और उज्जवला के साथ हैं और हर फ़ोटो में रोहित के प्रति उन का वात्सल्य छलकता बार-बार दिखता है। रोहित और क्या चाहते थे? कि वह एक सार्वजनिक जीवन जीते हुए सब को बताते फिरते कि देखो मैं रोहित का नाज़ायज़ पिता हूं और कि इस की मां मेरी रखैल है?
     सच यह है कि जब तक तिवारी जी सत्ता में रहे, सत्ता के फ़ायदे रोहित और उन की मा उज्जवला लूटती रहीं। बाद में जब तिवारी जी उन्हें फ़ायदा देने की स्थिति में नहीं रह गए तब यह मां-बेटे उन्हें भावनात्मक ब्लैकमेल करने लगे। तिवारी जी की संपत्ति के लिए। पर तिवारी जी के पास कोई संपत्ति होती तब न वह उन को देते? अपनी पैतृक संपत्ति तक का तो उन्हों ने ट्रस्ट बना दिया है। वह देते भी तो क्या देते उन्हें? और अभी भी वह क्या पा जाएंगे? दहाड़ तो रहे हैं रोहित कि हर कानूनी हक के लिए वह लड़ेंगे। अब बाकी तो संपत्ति की ही लड़ाई रह गई है न?
     खैर। कल्पना कीजिए कि अगर तिवारी जी भी रोहित और उज्जवला के स्तर की बेशर्मी पर कहीं उतर गए होते तो परिदृष्य कैसा होता भला? लेकिन तिवारी जी तो शुरु ही से विरोधियों का भी सम्मान करने के अभ्यस्त रहे हैं। वह अभी भी रोहित के खिलाफ़ कुछ नहीं कह रहे। बल्कि रोहित के साथ सहानुभूति जता रहे हैं। नहीं जानने को कौन नहीं जानता था कि तिवारी जी रोहित के नाज़ायज़ पिता हैं। बिलकुल शुरु ही से। रोहित ने खुद कहा है कि उन के दफ़्तर के लोग उन्हें बहुत आत्मीयता से खिलाते थे। तो क्या मुफ़्त में? फिर भी वह दुहराते हैं कि घर से बाहर निकलते ही टोपी पहन कर वह उन्हें भूल जाते थे। शशि कपूर द्वारा निर्मित श्याम बेनेगल की एक बहुत महत्वपूर्ण फ़िल्म है कलयुग। महाभारत की ही कथा को आधुनिक परिवेश में उन्हों ने इस फ़िल्म में बुना है। दो उद्योगपति परिवार की कहानी है। गांधारी, कुंती, धृतराष्ट्र, भीष्म पितामह सभी हैं। जिस में कर्ण की भूमिका खुद शशि कपूर ने की है। रेखा द्रौपदी की भूमिका में हैं, कुलभूषण खरबंदा भीम और अनंत नाग अर्जुन वाली भूमिका में। अदभुत फ़िल्म है। जब कर्ण को मारने की बात चलती है तो कुंती डर जाती है। और सभी बेटों को इकट्ठा बैठा कर राय मशविरा करते हुए ऐसा करने से मना करती है। और बताती है कि कर्ण तुम सब का सब से बडा़ भाई है। यह सुनते ही अर्जुन की भूमिका में अनंतनाग जैसे कुंती पर टूट पड़ता है। और लगभग दौडा़ लेता है मारने के लिए। चीखता है, ‘कुलटा कहीं की !बडी़ मुश्किल से राज बब्बर, कुलभूषण वगैरह अनंतनाग को काबू कर पाते हैं।फ़िल्मी ही सही एक दृष्य वह है और एक दृष्य यह है रोहित और उज्जवला का।
      तिवारी जी जैसे विनम्र व्यक्ति के साथ यह हादसा ही है। जो लोग तिवारी जी और उन की विनम्रता को जानते हैं, वह लोग समझ सकते होंगे उन का अंतर्द्वद्व। यहां अभी और बिलकुल अभी एक बार की घटना याद आ रही है। नारायणदत्त तिवारी तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। वोट बैंक के चक्कर में हाइकमान के निर्देश पर उन्हों ने उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा दे दिया था। इस के विरोध में पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी ने लगभग मुहिम सी चला दी थी तब। धरना प्रदर्शन सब किया।
एक बार उन्हों ने लखनऊ में हिंदी संस्थान से जी.पी.ओ. तक जुलूस निकाला। और मुख्यमंत्री को ज्ञापन देने की बात थी। अमूमन होता यही है कि मुख्यमंत्री वगैरह के औपचारिक ज्ञापन आदि ज़िला प्रशासन के अधिकारी या उन से जुडे़ अधिकारी् ही ले कर इतिश्री कर लेते हैं और ज्ञापन वहां तक ज़रुरी समझते हैं तो पहुंचा देते हैं। पर उस बार उपस्थित अधिकारियों को जब ज्ञापन देने की औपचारिक बात की चतुर्वेदी जी ने और पूछा कि ज्ञापन आप ही लोग लेंगे या मुख्यमंत्री जी लेंगे? तो उपस्थित अधिकारियों ने उन से कहा कि, ‘माननीय मुख्यमंत्री जी आप की प्रतीक्षा में हैं।चतुर्वेदी जी पहुंचे मुख्यमंत्री कार्यालय अपने साथियों के साथ। तिवारी जी न सिर्फ़ प्रतीक्षारत थे बल्कि खडे़ हो कर उन्हों ने चतुर्वेदी जी का लगभग स्वागत किया। प्रणाम कहा। और खड़े हो कर ही हाथ जोड़ कर ही उन से ज्ञापन लिया। चतुर्वेदी जी बहुत गुस्से में थे, तिवारी जी की इस विनम्रता ने उन का सारा गुस्सा पी लिया था। वह मुसकुराते हुए लौटे थे। बाद के दिनों में तिवारी जी से मैं ने पूछा कि, ‘अगर आप उन से सहमत थे, उन की मांगों को इस तरह स्वीकार कर रहे थे मान लेने में भी क्या हर्ज़ था?’ तिवारी जी ने कहा कि, ‘शासन और राजनीति की अपनी ज़रुरतें होती हैं पर इस सब के बावजूद, विरोध के बावजूद हम किसी को सम्मान तो दे ही सकते हैं, देना ही चाहिए। और फिर चतुर्वेदी जी विद्वान व्यक्ति हैं बुजुर्ग हैं, सम्मान का हक बनता है उन का।ऐसे ही एक बार संस्कृत अकादमी की ओर से सम्मान समारोह आयोजित था। राजभवन में। अध्यक्षता राज्यपाल कर रहे थे। सम्मन तिवारी जी दे रहे थे। मैं ने देखा कि किसी भी विद्वान को उन्हों ने मंच पर नहीं आने दिया। खुद दौड़-दौड़ कर सभी विद्वानों के पास वह पहुंचे और कि सब को सम्मानित किया। अपने भाषण में भी वह विनम्र हुए। और कहा कि वेद्पाठी पंडितों को ढाई हज़ार रुपए सम्मान राशि बहुत कम है। अब वेदपाठी पंडित मिलते कहां हैं? उन्हों ने सम्मान राशि बढा़ कर तुरंत दस हज़ार कर दी और कहा कि अभी तो चेक बन गया है पर बची राशि भी विद्वानों के घर पहुंच जाएगी। 
       आज कल तो राजनेताओं से सरकारी या कोई अन्य सम्मान लेना भी लगभग अपमान हो गया है। वह ऐसे हिकारत से पेश आते हैं विद्वानों से कि जैसे कोई बहुत निकृष्ट काम कर रहे हों। अव्वल तो अब राजनेता ऐसे सम्मान समारोहों से कतराने लगे हैं। जैसे कि उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का पुरस्कार कभी मुख्यमंत्री ही आते थे देने। पर मायावती कभी नहीं आईं ऐसे किसी समारोह में। किसी मंत्री को अपना प्रतिनिधि बना कर भेज देती थीं। मुलायम भी पिछले कार्यकाल में नहीं आते थे। और अब तो मायावती ने जाते-जाते दो-तीन पुरस्कार छोड़ कर सब रद्द कर दिए थे। अखिलेश सरकार ने उसे अभी तक बहाल नहीं किया है।
     एक समय यह पुरस्कार प्रधानमंत्री देने आते थे। एक बार मोरार जी देसाई आए थे। आचार्य किशोरीदास वाजपेयी को भारत-भारती सम्मान मिलना था। उन का नाम पुकारा गया पर वह मंच पर नहीं पहुंचे। दो बार, तीन बार पुकारा गया। वह नहीं गए। मोरार जी ने आयोजकों से खिन्न हो कर पूछा कि वह आए भी हैं? उन्हें बताया गया कि आए हुए हैं और वह सामने की लाइन में बैठे हुए हैं। मोरार जी समझ गए। वह मंच से खुद उतर कर वाजपेयी जी के पास पहुंचे और उन्हें सम्मानित किया। रघुवीर सहाय ने तब दिनमान में इस विषय पर संपादकीय लिखी थी और बताया था कि यह पहली बार है कि सम्मान पाने वाले का चेहरा फ़ोटो में दिखा। नहीं अमूमन सम्मान देने वाले का चेहरा दिखता है।
क्षमा करें ज़रा विषयांतर हो गया।
      पर क्या यह सम्मान समाज में किसी लेखक या किसी भी व्यक्ति का इस तरह रह गया है क्या? तिवारी जी का जो हाल मीडिया ने बीते कुछ वर्षों से बना रखा है, इस पितृत्व विवाद के चलते, लगता है जैसे वह कभी विकास पुरुष नहीं रहे, गिरहकट या लुच्चे हों। यह बहुत शर्मनाक है। किसी की निजी ज़िंदगी में मीडिया का इस तरह घुसपैठ किसी भी सूरत में ठीक नहीं है। पिता एक सम्मानित संस्था है उस को इस तरह लांछित करना किसी भी सभ्य समाज के लिए उचित नहीं है। पिता शब्द की गरिमा को बनाए रखना ज़रुरी भी है। तिवारी जी रोहित के पिता थे, यह रोहित और उज्ज्वला ही नहीं बहुतेरे लोग वर्षों से जानते थे। डी.एन.ए.टेस्ट ने अब उस पर एक मुहर लगा दी है। उन फ़ोटुओं को एक बार फिर से निहारिए जिस में रोहित के प्रति तिवारी जी का प्यार उन का वात्सल्य छ्लक रहा है। अनेक फ़ोटो इस की गवाह हैं। अगर सिर्फ़ ऐयाशी ही की ही भावना रही होती तो वह तमाम पुरुषों की तरह कतरा गए होते। और कम से कम साल दर साल हर जन्म-दिन पर फ़ोटो तो नहीं ही खिंचवाते। गलती उन से हुई है, सार्वजनिक जीवन जीने की मर्यादा उन्हों ने लांघी है पर इस बिना पर उन के पितृत्व को इस तरह चौराहे पर खडा़ कर लांछित तो मत कीजिए। सुन रही हैं उज्जवला जी, रोहित जी और मीडिया की दुकानें? और फिर बिचारे बी.पी शर्मा को भी समाज में मुंह दिखाने भर के लिए जीने का हक देंगे कि नहीं?
      क्या पुरुष होना इतना बडा़ गुनाह है? कि औरत के सारे गुनाह माफ़ और पुरुष को फांसी ! 
      यह ठीक है कि पिता घोषित हो कर तिवारी जी हार गए हैं। बालेश्वर एक गाना गाते थे कि, ‘जे केहू से नाईं हारल/ ते हारि गइल अपने से !तो तिवारी जी अपनों से हार गए हैं। और जो इसी बात को इस तरह भी देखना चाहें तो देख सकते हैं, कि बेटे से हार कर भी अंतत: पिता की ही जीत होती है। पिता के लिए इस से बडा़ सुख कोई और होता नहीं कि वह अपने ही जाए से हार जाए।      

लेखक के बारे में

दयानंद पांडेय न सिर्फ वरिष्‍ठ पत्रकार तथा उपन्‍यासकार हैं. 
अगर आप उन्हें पढेंगे उन्हें जानेंगे तो पाएंगे कि 
वो समकालीन पत्रकारिता के लिए एक पूरी संस्था हैं
दयानंद से संपर्क 
09415130127, 09335233424 
और dayanand.pandey@yahoo.com 
के जरिए किया जा सकता है

"साफ सफाई करता बेहतर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज 29 जुलाई को
उड़नतश्तरी वाले समीर लाल जी का जन्म दिन है।
इस अवसर पर मैं उनको
हार्दिक शुभकामनाएँ और बधाइयाँ प्रेषित करता हूँ!
लगभग 2 वर्ष पूर्व उन्होंने मेरी बालकृति
नन्हे सुमन” की भूमिका लिखी थी!
सबसे पहले देखिए 
नन्हे सुमन से यह बालकविता
कौआ बहुत सयाना होता।
कर्कश इसका गाना होता।।

पेड़ों की डाली पर रहता।
सर्दी, गर्मी, वर्षा सहता।।

कीड़े और मकोड़े खाता।
सूखी रोटी भी खा जाता।।

सड़े मांस पर यह ललचाता।
काँव-काँव स्वर में चिल्लाता।।

साफ सफाई करता बेहतर।
काला-कौआ होता मेहतर।।
एक अद्भुत संसार - नन्हें सुमन
            आज की इस भागती दौड़ती दुनिया में जब हर व्यक्ति अपने आप में मशगूल है। वह स्पर्धा के इस दौर में मात्र वही करना चाहता है जो उसे मुख्य धारा में आगे ले जायेऐसे वक्त में दुनिया भर के बच्चों के लिए मुख्य धारा से इतर कुछ स्रजन करना श्री रुपचन्द्र शास्त्रीमयंक’ जैसे सहृदय कवियों को एक अलग पहचान देता है।
          ‘मयंक’ जी ने बच्चों के लिए रचित बाल रचनाओं के माध्यम से न सिर्फ उनके ज्ञानवर्धन एवं मनोरंजन का बीड़ा उठाया है बल्कि उन्हें एक बेहतर एवं सफल जीवन के रहस्य और संदेश देकर एक जागरूक नागरिक बनाने का भी बखूबी प्रयास किया है।
          पुस्तक नन्हें सुमन’ अपने शीर्षक में ही सब कुछ कह जाती है कि यह नन्हें-मुन्नों के लिए रचित काव्य है। परन्तु जब इसकी रचनायें पढ़ी तो मैंने स्वयं भी उनका भरपूर आनन्द उठाया। बच्चों के लिए लिखी कविता के माध्यम से उन्होंने बड़ों को भी सीख दी है!
डस्टर’ बहुत कष्ट देता है’’ कविता का यह अंश बच्चों की कोमल पीड़ा को स्पष्ट परिलक्षित करता है-

‘‘कोई तो उनसे यह पूछे,
क्या डस्टर का काम यही है?
कोमल हाथों पर चटकाना,
क्या इसका अपमान नही है?’’

नन्हें सुमन’ में छपी हर रचना अपने आप में सम्पूर्ण है और उनसे गुजरना एक सुखद अनुभव है। उनमें एक जागरूकता हैज्ञान हैसंदेश है और साथ ही साथ एक अनुभवी कवि की सकारात्मक सोच है।
          आराध्य माँ वीणापाणि की आराधना करते हुए कवि लिखता है-

‘‘तार वीणा के सुनाओ कर रहे हम कामना।
माँ करो स्वीकार नन्हे सुमन की आराधना।।
इस धरा पर ज्ञान की गंगा बहाओ,
तम मिटाकर सत्य के पथ को दिखाओ,
लक्ष्य में बाधक बना अज्ञान का जंगल घना।
माँ करो स्वीकार नन्हे सुमन की आराधना।।’’

          मेरे दृष्टिकोण से तो यह एक संपूर्ण पुस्तक है जो बाल साहित्य के क्षेत्र में एक नया प्रतिमान स्थापित करेगी। मुझे लगता है कि इसे न सिर्फ बच्चों को बल्कि बड़ों को भी पढ़ना चाहिये।
          मेरा दावा है कि आप एक अद्भुत संसार सिमटा पायेंगे नन्हें सुमन’ मेंबच्चों के लिए और उनके पालकों के लिए भी!
          कवि ‘‘मयंक’’ को इस श्रेष्ठ कार्य के लिए मेरा साधुवादनमन एवं शुभकामनाएँ!

-समीर लाल समीर
http://udantashtari.blogspot.com/
36, Greenhalf Drive
Ajax, ON
Canada

शनिवार, 28 जुलाई 2012

"घास खाना जानते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


हम गधे इस देश के है, घास खाना जानते हैं।
लात भूतों के सहजता से, नहीं कुछ मानते हैं।।

मुफ्त का खाया हमॆशा, कोठियों में बैठकर.
भाषणों से खेत में, फसलें उगाना जानते हैं।

कृष्ण की मुरली चुराई, गोपियों के वास्ते,
रात-दिन हम, रासलीला को रचाना जानते हैं।

राम से रहमान को, हमने लड़ाया आजतक,
हम मज़हव की आड़ में, रोटी पकाना जानते हैं।

देशभक्तों को किया है, बन्द हमने जेल में,
गीदड़ों की फौज से, शासन चलाना जानते हैं।

सभ्यता की ओढ़ चादर, आ गये बहुरूपिये,
छद्मरूपी रूपसे, दौलत कमाना जानते हैं।

शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

"परबत बनेंगे, सड़क धीरे-धीरे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


बढ़ेंगे तुम्हारी तरफ धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

नया है मुसाफिर, नयी जिन्दगी है,
नया फलसफा है, नयी बन्दगी है,
पढ़ेंगे-लिखेंगे, बरक धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

उल्फत की राहों की सँकरी गली है,
अभी सो रही गुलिस्ताँ की कली है,
मिटेगा दिलों का फरक धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

दुर्गम डगर में हैं चट्टान भारी,
हटानी पड़ेंगी, परत आज सारी,
परबत बनेंगे, सड़क धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

“रूप” को छूकर नहीं मैला करो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


तुम कभी तो प्यार से बोला करो।
राज़ दिल के तो कभी खोला करो।।

हम तुम्हारे वास्ते घर आये हैं,
मत तराजू में हमें तोला करो।

ज़र नहीं है पास अपने तो ज़िगर है,
चासनी में ज़हर मत घोला करो।

डोर नाज़ुक है उड़ो मत फ़लक में,
पेण्डुलम की तरह मत डोला करो।

राख में सोई हैं कुछ चिंगारियाँ,
मत हवा देकर इन्हें शोला करो।

आँख से देखो-सराहो दूर से,
रूप को छूकर नहीं मैला करो।

"उल्लुओं सी सोच मत रक्खा करो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
हौसले के साथ में आगे बढ़ो
फासले इतने न अब पैदा करो।

जिन्दगी तो है हकीकत पर टिकी,
मत इसे जज्बात में रौंदा करो।

चाँद-तारों से भरी इस रात में,
उल्लुओं सी सोच मत रक्खा करो।

बुलबुलों से ज़िन्दगी की सीख लो,
राग अंधियारों का मत छेड़ा करो।

उलझनों का नाम ही है जिन्दगी,
हारकर, थककर न यूँ बैठा करो।

छोड़कर शिकवें-गिलों की बात को,
मुल्क पर जानो-जिगर शैदा करो।

खूबसूरत दिल सजा हर जिस्म में,
 “रूप पर इतना न मत ऎंठा करो।

बुधवार, 25 जुलाई 2012

"उन्हें हम प्यार करते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


हमारा ही नमक खाते, हमीं पर वार करते हैं।
जहर मॆं बुझाकर खंजर, जिगर के पार करते हैं।।

शराफत ये हमारी है, कि हम बर्दाश्त करते हैं,
नहीं वो समझते हैं ये, उन्हें हम प्यार करते हैं।

हमारी आग में तपकर, कभी पिघलेंगे पत्थर भी,
पहाड़ों के शहर में हम, चमन गुलज़ार करते हैं।

कहीं हैं बर्फ के जंगल, कहीं ज्वालामुखी भी हैं,
कभी रंज-ओ-अलम का हम, नहीं इज़हार करते हैं।

अकीदा है छिपा होगा, कोई भगवान पत्थर में,
इसी उम्मीद में हम, रोज ही बेगार करते हैं।

नहीं है रूप से मतलब, नहीं है रंग की चिन्ता,
तराशा है जिसे रब ने, उसे स्वीकार करते हैं।

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

"धोखा मिला चाँदनी रात में" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी पुरानी डायरी से एक ग़ज़ल
 
मन हुआ अनमना बात ही बात में।
खो गया मैं कहाँ जाने ज़ज्बात में।।

दिल की दौलत लुटाई बड़े चाव से,
उसने लूटा खजाना मुलाकात में।

जाल पर जाल वो फेंकते ही गये,
कितना जादू था उनके ख़यालात में।

देर से ही सही सच उजागर हुआ,
सिर्फ छल-छद्म था उनकी सौगात में।

रूप पर उनके दिल था दिवाना हुआ,
मुझको धोखा मिला चाँदनी रात में।

सोमवार, 23 जुलाई 2012

"धरती आज तरसती है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

   
नदिया-नाले सूख रहे हैं, जलचर प्यासे-प्यासे हैं।
पौधे-पेड़ बिना पानी के, व्याकुल खड़े उदासे हैं।।

चौमासे के मौसम में, सूरज से आग बरसती है।
जल की बून्दें पा जाने को, धरती आज तरसती है।।

नभ की ओर उठा कर मुण्डी, मेंढक चिल्लाते हैं।
बरसो मेघ धड़ाके से, ये कातर स्वर में गाते हैं।।

दीन-कृषक है दुखी हुआ, बादल की आँख-मिचौली से।
पानी अब तक गिरा नही, क्यों आसमान की झोली से?

तितली पानी की चाहत में दर-दर घूम रही है।
फड़-फड़ करती तुलसी की ठूँठों को चूम रही है।।

दया करो घनश्याम, सुधा सा अब तो जम करके बरसो।
रिमझिम झड़ी लगा जाओ, अब क्यों करते कल-परसों?

रविवार, 22 जुलाई 2012

"आई तीजो हरियाली" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


बरस रहे हैं जमकर बादल, धरा हुई है मतवाली।
शुरू हुए रमजान मुकद्दस, आई तीजो हरियाली।।

अब आँगन में नहीं, पड़े छत के कुण्डे में झूले हैं,
सखियों के संग झूलीं बाला, मन खुशियों से फूले हैं,
मेंहदी रची हथेली, अधरों पर लगती प्यारी लाली।
शुरू हुए रमजान मुकद्दस, आई तीजो हरियाली।।

मेघ-मल्हारों के गानों से, चहका है घर और आँगन,
सोंधी-सोंधी गन्ध समायी, महका सारा वन-उपवन,
पुरवय्या के झोंके पाकर, झूम रही डाली-डाली।
शुरू हुए रमजान मुकद्दस, आई तीजो हरियाली।।

बैठी हुई घरों में अपने, बुलबुल गातीं राग मधुर,
लहराते हैं धान खेत में, झींगुर बजा रहे नूपुर,
टर्र-टर्र मेढक चिल्लाते, घटा देख काली-काली।
शुरू हुए रमजान मुकद्दस, आई तीजो हरियाली।।

परदेसों में साजन जिनके, उनको विरह सताता है,
रिमझिम मस्त फुहारों वाला, पानी आग लगाता है,
भँवरों का मीठी गुंजन भी, लगती जैसे हो गाली।
शुरू हुए रमजान मुकद्दस, आई तीजो हरियाली।।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails