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मंगलवार, 10 मई 2011

"बचपन होता बहुत निराला" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


चंचल मन होता मतवाला।
बचपन होता बहुत निराला।। 
Butterfly Coloring Pages 2
दीवारों पर चित्र बनाते,
देख तितलियाँ रंग-बिरंगी।
बैंगन-आम और लौकी की,
चित्रकला करते बेढंगी।
पापा-मम्मी खुश हो जाते,
जब करता था पन्ना काला।
बचपन होता बहुत निराला।।
  
जी भरकर तब खेल खेलते,
कभी-कभी गुस्सा दिखलाते।
लेकिन गाँठ न मन में रखते,
फिर संगी-साथी बन जाते।
बस्ता-तख्ती लेकर जातीं,
संग में मेरे मुन्नी-माला।
बचपन होता बहुत निराला।।
 
बगिया में चुपके से जाते,
कच्चे आम तोड़कर लाते।
फिर चटकारे लेकर खाते,
पापाजी तब डाँट पिलाते,
जब घर में आ जाता,
मेरे पीछे-पीछे अमियोंवाला।
बचपन होता बहुत निराला।। 

14 टिप्‍पणियां:

  1. बचपन की खूबसूरत यादों को ताजा करती इस सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए बहुत बहुत आभार शास्त्री जी.

    ' जी भरकर तब खेल खेलते,कभी-कभी गुस्सा दिखलाते।लेकिन गाँठ न मन में रखते,फिर संगी-साथी बन जाते।'
    निश्छल मन निष्कपट व्यवहार.
    हमें तो आप भी ऐसे ही लगतें है शास्त्री जी.

    उत्तर देंहटाएं
  2. सही बात. बचपन का कोई मुक़ाबला नहीं.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बचपन को आपने कविता में उतार दिया है ...सुन्दर रचना .

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दरता से आपने इस रचना को प्रस्तुत किया है! मैं तो अपने बचपन के दिनों को याद करने लगी! मन प्रसन्न हो गया!

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत निराला । काश कि फिर वापिस आ सकता। सुन्दर अभिव्यक्ति। आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बचपन की मीठी यादों को बहुत सुन्दरता से उकेरा है…………शानदार अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बचपन के दिन भी क्या दिन थे
    उड़ते -फिरते तितली बन !

    कोई लोटा दे मेरे बचपन के वो दिन

    उत्तर देंहटाएं
  8. चंचल मन होता मतवाला, बचपन होता बहुत निराला।

    बहुत खूब गुरु जी, आपकी इस कविता ने बचपन की याद दिला दी. बहुत-बहुत साधुवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  9. वाकई...बचपन बहुत निराला.

    उत्तर देंहटाएं
  10. सहमत हे जी बचपन मै सब राजा होते हे

    उत्तर देंहटाएं
  11. सचमुच बचपन बहुत निराला......बहुत प्यारी रचना

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत सुन्दर रचना..सचमुच बचपन का कोई ज़वाब नहीं..आभार

    उत्तर देंहटाएं

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