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रविवार, 1 मई 2011

ग़जल-आशा शैली 'हिमाचली' (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

गुलों के रंग, तितलियाँ लिए चमन आए
मिरी भी राह में तारों की अंजुमन आए

बुलन्द हैं तो रहें, घर की सभी दीवारें
ये खिड़कियाँ ही खोल सामने गगन आए

सफ़र के वास्ते फिर सँभाल लूँ सामां
न पेश फिर कहीं बीमार ये बदन आए

नहीं है और कुछ तो मित्रवर तुम्हारे लिए
तुम्हारे काम ये शायद मिरा सुख़न आए

घिरा है अब्र अभी बर्फ़ गिर भी सकती है
जलाओ घर में अँगीठी कि बाँकपन आए
आशा शैली 'हिमाचली'

10 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी गजल हर पंक्ति सुंदर बनी है

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (2-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर लिखा आपने. बधाई.
    कल आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा.

    आपका स्वागत है.
    दुनाली चलने की ख्वाहिश...
    तीखा तड़का कौन किसका नेता?

    उत्तर देंहटाएं
  4. गजल पढ़ कर अच्छी लगी.आभार.
    कल आपके दर्शनों का तो मौका मिला,पर मुलाकात नहीं हो पायी.
    पुरस्कार पाने के लिए बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  5. खूबसूरत ग़ज़लक़े लिए आशा जी के लिए बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  6. आशाजी की खूबसूरत गज़ल पढवाने के लिए आभार

    उत्तर देंहटाएं

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