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शुक्रवार, 13 मई 2011

"कैसे लिखूँ ग़ज़ल का मतला.." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


कैसे लिखूँ ग़ज़ल का मतला, मक्ता कैसे पाऊँ मैं।
वनवासी दुनिया में कैसे, अपने शेर सजाऊँ मैं। 

नहीं रहे अब झाड़ी जंगल, भटक रहा हूँ राहों में,
पात-पात में छुपे शिकारी, कैसे जान बचाऊँ मैं।
 

आफताब़-महताब़ उन्हीं के, जिनके केवल नाम बड़े,
जालजगत के सिवा शायरी, बोलो कहाँ लगाऊँ मैं।
 

सोनचिरय्या के सब गहने, छीन लिए गौरय्यों ने,
खर-पतवार भरे खेतों में, कैसे धान उगाऊँ मैं।

पूजा होती “रूप” रंग की, ज्ञानी याचक-चाकर हैं
लुप्त हुए चाणक्य, कहाँ से सुथरा-शासन लाऊँ मैं।

6 टिप्‍पणियां:

  1. Hurrrey Blogger chalne laga... lekin 2 din purani post aur comment delete ho gaye hain....

    :-(

    उत्तर देंहटाएं
  2. पूजा होती “रूप” रंग की, ज्ञानी याचक-चाकर हैं
    लुप्त हुए चाणक्य, कहाँ से सुथरा-शासन लाऊँ मैं।
    bahut sahi kaha aapne aaj kal to suthre shasan ki kalpana maatr hi rah gai hai.nice gazhal.

    उत्तर देंहटाएं
  3. कैसे झुठलाऊं मैं कि आप बड़े ब्लॉगर हैं
    ‘जय हो‘,आप सा दूजा कहां से लाऊं मैं

    उत्तर देंहटाएं
  4. कैसे लिखूँ ग़ज़ल का मतला, मक्ता कैसे पाऊँ मैं।
    वनवासी दुनिया में कैसे, अपने शेर सजाऊँ मैं।
    यह शेर तो अच्छा लगा मुबारक हो....

    उत्तर देंहटाएं
  5. पूजा होती “रूप” रंग की, ज्ञानी याचक-चाकर हैं
    लुप्त हुए चाणक्य, कहाँ से सुथरा-शासन लाऊँ मैं।........bahut badhiya Sir!

    उत्तर देंहटाएं

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