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सोमवार, 30 मई 2011

"पंछी उड़ता नीलगगन में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

 आभासी दुनिया के लोगों से बात करते-करते
आज यह गीत बन गया!
कोई ख्याल नहीं है मन में।
पंछी उड़ता नीलगगन में।।

सफर चल रहा है अनजाना,
नहीं लक्ष्य है नहीं ठिकाना,
कब आयेगा समय सुहाना,
कब सुख बरसेगा आँगन में।
पंछी उड़ता नीलगगन में।।

कब गाएगी कोकिल गाने,
गूँजेंगे कब मधुर तराने,
सब बुनते हैं ताने-बाने,
कब सरसेगा सुमन चमन में।
पंछी उड़ता नीलगगन में।।

सूख रही है डाली-डाली,
नज़र न आती अब हरियाली,
सब कुछ लगता खाली-खाली,
झंझावात बहुत जीवन में।
पंछी उड़ता नीलगगन में।।

कहाँ गया वो प्यार सलोना,
काँटों से है बिछा बिछौना,
मनुज हुआ क्यों इतना बौना,
मातम पसरा आज वतन में।
पंछी उड़ता नीलगगन में।।

यौवन जैसा रूप कहाँ है,
खुली हुई वो धूप कहाँ है,
प्यास लगी है, कूप कहाँ है,
खरपतवार उगी उपवन में।
पंछी उड़ता नीलगगन में।।

28 टिप्‍पणियां:

  1. सरल शब्द, गहन भाव सीधे मन में उतरते हुये।

    उत्तर देंहटाएं
  2. कहाँ गया वो प्यार सलोना,
    काँटों से है बिछा बिछौना,
    मनुज हुआ क्यों इतना बौना,
    मातम पसरा आज वतन में।
    पंछी उड़ता नीलगगन में।।

    गीत में ज़बरदस्त प्रवाह है.भाषा,भाव सब कुछ मनमोहक.वाह शास्त्री जी.

    उत्तर देंहटाएं
  3. कहाँ गया वो प्यार सलोना,
    काँटों से है बिछा बिछौना,
    मनुज हुआ क्यों इतना बौना,
    मातम पसरा आज वतन में।
    पंछी उड़ता नीलगगन में।।
    बहुत सुन्दर, मनमोहक और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने!

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेहतरीन।
    सुंदर छंदों में, बड़ी सहजता से, गहनतम अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  5. कहाँ गया वो प्यार सलोना,
    काँटों से है बिछा बिछौना,
    मनुज हुआ क्यों इतना बौना,
    मातम पसरा आज वतन में।
    पंछी उड़ता नीलगगन में।।

    @ मंयक जी ! आपकी चिंता वाजिब है। इन्हीं बौनों ने ब्लॉगिंग में भी क़दम रख दिए हैं बल्कि जमा भी लिए हैं। ये लोग ‘टिप्पणी में भ्रष्टाचार‘ मचाते देखे भी जा सकते हैं। इन्हें बड़ा बनाने के प्रयास हमने शुरू कर दिए हैं।
    शुक्रिया ।

    ‘टिप्पणी के भ्रष्टाचार‘ से मुक्त होता है बड़ा ब्लॉगर

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी हर रचना पहले वाली से और बेहतर होती है..

    उत्तर देंहटाएं
  7. आपकी हर एक रचना मे एक संदेश छुपा होता है.
    प्रणाम

    उत्तर देंहटाएं
  8. कहाँ गया वो प्यार सलोना,
    काँटों से है बिछा बिछौना,
    मनुज हुआ क्यों इतना बौना,
    मातम पसरा आज वतन में।
    पंछी उड़ता नीलगगन में।aapki her rachanaa laajabab hoti hai.bahut hi saarthak rachna sunder aur saral shabdon main aek achcha sandesh deti hui .badhaai aapko.

    उत्तर देंहटाएं
  9. कहाँ गया वो प्यार सलोना,
    काँटों से है बिछा बिछौना,
    मनुज हुआ क्यों इतना बौना,
    मातम पसरा आज वतन में।
    पंछी उड़ता नीलगगन में।

    गीत के माध्यम से सार्थक चिन्ता व्यक्त कर दी है ..सुन्दर गीत

    उत्तर देंहटाएं
  10. ये हुआ ना आभासी दुनिया का सदुपयोग्………बहुत सुन्दर गीत बना है गुनगुनाये जा सकने वाला।

    उत्तर देंहटाएं
  11. कहाँ गया वो प्यार सलोना,
    काँटों से है बिछा बिछौना,
    मनुज हुआ क्यों इतना बौना,
    मातम पसरा आज वतन में।

    ....मन को छूती बेहतरीन प्रस्तुति..आभार

    उत्तर देंहटाएं
  12. saral shabd......sachi hai man ki abhivuakti...bahut khub bhai ji

    उत्तर देंहटाएं
  13. वाह! मन को पखेरू मान कर बहुत सुंदर रचना प्रस्तुत की है आपने शास्त्री जी|

    उत्तर देंहटाएं
  14. गीत में .... भाषा...........भाव ........प्रवाह है

    उत्तर देंहटाएं
  15. जिन्‍दगी की सच्‍चाई बताती बहुत अच्‍छी रचना। प्रेम वास्‍तव में तिरोहित होता जा रहा है।

    उत्तर देंहटाएं
  16. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 31 - 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच

    उत्तर देंहटाएं
  17. @कोई ख्याल नहीं है मन में।
    पंछी उड़ता नीलगगन में।।
    वाकई , गज़ब की पंक्तियाँ . कोई ख्याल मन में नहीं होने की बात कहकर भी आपने कितने सारे ख़याल उकेर दिए अपनी इस रचना में. खास तौर पर ये पंक्तियाँ
    "कहाँ गया वो प्यार सलोना,
    काँटों से है बिछा बिछौना,
    मनुज हुआ क्यों इतना बौना,
    मातम पसरा आज वतन में।
    पंछी उड़ता नीलगगन में।।"
    इस बेहतरीन कविता के लिए बधाई और शुभकामनाएं

    उत्तर देंहटाएं
  18. खुली हुई वो धूप कहाँ है
    प्यास लगी है, वो कूप कहाँ है
    खरपतवार उगी उपवन में
    पंछी उड़ता नील गगन में....
    बेहतरीन रचना......

    उत्तर देंहटाएं

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