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बुधवार, 18 मई 2011

"मरहम लगाना जानता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


मित्रों!
एक नवगीत बन गया है!
-0-0-0-
क्रोध को उत्तर हँसी में,
जो सुनाना जानता है!
घाव पर वो ही तरल,
मरहम लगाना जानता है!!

वेदना को शब्द कोई,
दे नहीं सकता कभी!
जब लगी हो चोट कोई,
आह उठती है तभी!! 
कर रहा जो, रात-दिन हो वन्दना,
रोग सारे वो मिटाना जानता है!

हो सुरीला कण्ठ तो,
वीणा बजाती शारदा,
मौन को छलती हमेशा,
सलिल-सरिता शारदा,
पर्वतों का क्षुद्र धारा,
गीत गाना जानता है!

रुदन तो नवजात का,
लगता सभी को है भला,
हो गया निष्प्राण तन,
जब हंस नभ को उड़ चला,
वो बिना परवाज़ के,
मंजिल स्वयं पहचानता है! 

25 टिप्‍पणियां:

  1. रुदन तो नवजात का,
    लगता सभी को है भला,
    हो गया निष्प्राण तन,
    जब हंस नभ को उड़ चला,
    वो बिना परवाज़ के,
    मंजिल स्वयं पहचानता है!

    वाह वाह आपसे तो बात की बात मे रचनाये बनाना सीखना चाहिये…………बहुत ही सुन्दर नवगीत्…………गज़ब के भाव भरे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  2. हो सुरीला कण्ठ तो,
    वीणा बजाती शारदा,
    मौन को छलती हमेशा,
    सलिल-सरिता शारदा,
    पर्वतों का क्षुद्र धारा,
    गीत गाना जानता हैprakarti ko sakaar kar diya aapne.jeevan chakra ke ird gird ghoomti rachna bahut bhali lagi.

    उत्तर देंहटाएं
  3. रुदन तो नवजात का,
    लगता सभी को है भला,
    हो गया निष्प्राण तन,
    जब हंस नभ को उड़ चला,
    वो बिना परवाज़ के,
    मंजिल स्वयं पहचानता है!

    बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना..बहुत प्रवाहमयी अभिव्यक्ति..

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुंदर शब्दों से आपने कमाल का गीत रच दिया है शास्त्री जी ..बहुत ही कमाल ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना|धन्यवाद|

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत खूबसूरत ....क्या प्रस्तुति है ..वाह
    ajit

    उत्तर देंहटाएं
  7. रुदन तो नवजात का,
    लगता सभी को है भला,
    हो गया निष्प्राण तन,
    जब हंस नभ को उड़ चला,
    वो बिना परवाज़ के,
    मंजिल स्वयं पहचानता है!

    जवाब नहीं इस रचना का भी। इसमें तो आपने मौत और हयात का ज़िक्र भी किया और बहुत से दृश्य साक्षात भी कर दिये।
    मज़ा आ गया इसे पढ़कर।
    धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  8. रचना के प्रवाह की दाद देनी पड़ेगी और नवगीत में सहजता और सरलता का जो पुट है वो तो बस देखते ही बनता है .वाह.

    उत्तर देंहटाएं
  9. रुदन तो नवजात का,
    लगता सभी को है भला,
    हो गया निष्प्राण तन,
    जब हंस नभ को उड़ चला,
    वो बिना परवाज़ के,
    मंजिल स्वयं पहचानता है!
    बहुत खूब ! बिलकुल नवजात शिशु की तरह ! मोहक और प्यारा -सा ..

    उत्तर देंहटाएं
  10. ...और यह जानकर और भी अजीब सा मज़ा आया कि आपने यह गीत अपना दर्द मिटाने के लिए लिखा है। बर्र ने आपके डंक मारा और आपके टीस उठी तो ऐसा मीठा गीत निकला ?
    आप एक सच्चे रचनाकार हैं।
    आप एक सच्चे ब्लॉगर हैं।
    क्योंकि आदर्श ब्लॉगर हर हाल में एक पोस्ट तैयार करता है।
    देखें मेरा लेख :

    कोई भी घटना हो तो एक आदर्श ब्लागर के दिमाग़ में तुरंत एक पोस्ट का विचार आना चाहिए . The ideal blogger

    उत्तर देंहटाएं
  11. आप तो गीतों के जादूगर हैं.अब देखिये न बर्रैया ने काटा तो भी गीत निकाल लिया.ग़ज़ब है ग़ज़ब.

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना|

    उत्तर देंहटाएं
  13. हो सुरीला कण्ठ तो,
    वीणा बजाती शारदा,
    मौन को छलती हमेशा,
    सलिल-सरिता शारदा,
    पर्वतों का क्षुद्र धारा,
    गीत गाना जानता
    bahut hi sundar aur bhavprn geet.

    उत्तर देंहटाएं
  14. बहुत ही सुन्दर नवगीत्...प्रवाहमयी अभिव्यक्ति..मज़ा आ गया इसे पढ़कर।

    उत्तर देंहटाएं
  15. रुदन तो नवजात का,
    लगता सभी को है भला,
    हो गया निष्प्राण तन,
    जब हंस नभ को उड़ चला,
    वो बिना परवाज़ के,
    मंजिल स्वयं पहचानता है!

    bahut khoob babu ji...aabhar

    उत्तर देंहटाएं
  16. क्या बात है हुज़ूर.... बहुत ख़ूब !

    उत्तर देंहटाएं
  17. बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना! हर एक पंक्तियाँ दिल को छू गयी!

    उत्तर देंहटाएं
  18. क्रोध को हँसी से जीतने कि कला जिसे आ गयी वही मुकद्दर का सिकन्दर है, बहुत सुंदर प्रेरणादायी गीत !

    उत्तर देंहटाएं
  19. जहाँ सबके अहंकार घायल हों...वहां मरहम ही काम आएगा...जो दूसरों को खुश रखना जानता हो...उसे ही मंजिल का पाता होगा...सुन्दर रचना...

    उत्तर देंहटाएं

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