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रविवार, 29 मई 2011

"किसने कहा रहो तुम सहमत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

रोज लिखे अफसाने हमने,
मगर उठाई नहीं आपने,
कभी इन्हें पढ़ने की ज़हमत!

जो मन में आता कह जाते,
हम हँसते-हँसते सह जाते,
किसने कहा रहो तुम सहमत!!

कोमल मन पर बोझ लादकर,
उड़ न सकोगे नीलगगन पर,
नहीं आपके बस की मेहनत!
किसने कहा रहो तुम सहमत!!

क्यों बैठे गुमसुम उपवन में,
कलिका बनकर खिलो चमन में,
नाहक ही होते हो आहत!
किसने कहा रहो तुम सहमत!!

आग दिलों में बनकर बसते,
अंगारा से खुलकर हँसते,
कुछ तो दिखला देते हिम्मत!
किसने कहा रहो तुम सहमत!!

कुमुद-कुमुदिनी खिले पंक में,
शीतलता होती "मयंक" में,
दीवानी होती है चाहत!
किसने कहा रहो तुम सहमत!!

34 टिप्‍पणियां:

  1. आग दिलों में बनकर बसते,
    अंगारा से खुलकर हँसते,
    कुछ तो दिखला देते हिम्मत!
    किसने कहा रहो तुम सहमत!!

    इन पंक्तियो मे जीवन की सच्चाई छुपी हुई है

    उत्तर देंहटाएं
  2. असहमति भी सहमति का ही दूसरा पहलू है, दूसरा पक्ष है..

    उत्तर देंहटाएं
  3. जो मन में आता कह जाते,
    हम हँसते-हँसते सह जाते,
    किसने कहा रहो तुम सहमत!!

    बहुत अच्छी लगीं ये पंक्तियाँ .

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  4. कोमल मन पर बोझ लादकर,उड़ न सकोगे नीलगगन पर,नहीं आपके बस की मेहनत!किसने कहा रहो तुम सहमत!
    bahut sundar .

    उत्तर देंहटाएं
  5. @ जनाब मयंक जी ! आपकी हरेक कली और हरेक बंद अनुपम सा है लेकिन अंत में तो बात ही क्या ख़ूब कह डाली है ।
    कुमुद-कुमुदिनी खिले पंक में,
    शीतलता होती "मयंक" में,
    दीवानी होती है चाहत!
    किसने कहा रहो तुम सहमत!!


    ख़ुशी के अहसास के लिए आपको जानना होगा कि ‘ख़ुशी का डिज़ायन और आनंद का मॉडल‘ क्या है ? - Dr. Anwer Jamal

    उत्तर देंहटाएं
  6. क्यों बैठे गुमसुम उपवन में,
    कलिका बनकर खिलो चमन में,
    नाहक ही होते हो आहत!
    किसने कहा रहो तुम सहमत!! अब ये भी नही कह सकते सही लिखा शास्त्री जी,हा हा हा हा,अच्छी और सच्ची रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सही लिखा है। खासकर ब्लॉगजगत के संदर्भ में .....

    उत्तर देंहटाएं
  8. चलिये इसी बात पर सहमत,
    संग रहें यदि नहीं संग मत।

    उत्तर देंहटाएं
  9. सहमति कहने से नहीं होती..वह तो दिल से होती है और वह है
    -----देवेंद्र गौतम

    उत्तर देंहटाएं
  10. कुमुद-कुमुदिनी खिले पंक में,
    शीतलता होती "मयंक" में,
    दीवानी होती है चाहत!
    किसने कहा रहो तुम सहमत!!
    ...दीवानगी में कौन सलामत रह पाता है...
    बहुत बढ़िया प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  11. कुमुद-कुमुदिनी खिले पंक में,
    शीतलता होती "मयंक" में,
    दीवानी होती है चाहत!
    किसने कहा रहो तुम सहमत!!

    यही ज़िन्दगी का सत्य है कि सबको सहमत रखा भी नही जा सकता…………बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  12. आज कुछ अलग से अंदाज़ में आपकी रचना पढने को मिली ... विचारणीय पोस्ट

    उत्तर देंहटाएं
  13. वाह जी वाह कभी 'रूप' कभी 'मयंक' तो फिर 'चन्द्र' भी तो होंना चाहिये.मैं तो आपकी पंक्तियों को ऐसे पढूंगा

    कुमुद-कुमुदिनी खिलें पंक में,शीतलता होती'चन्द्र'में
    दीवानी होती है चाहत!किसने कहा रहो तुम सहमत!!

    अब आप सहमत हो या न हों शास्त्री जी,हमने तो अपनी बात लिख दी है.

    उत्तर देंहटाएं
  14. जो मन में आता कह जाते,
    हम हँसते-हँसते सह जाते,

    Very Beautifully written... Thanks for Sharing this Poem with us Shastriji

    उत्तर देंहटाएं
  15. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (30-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  16. पता नही जी, हम ने तो नही कहा किसी से कि ...तुम सहमत हो:)

    उत्तर देंहटाएं
  17. क्यों बैठे गुमसुम उपवन में,
    कलिका बनकर खिलो चमन में,
    नाहक ही होते हो आहत!
    किसने कहा रहो तुम सहमत!!
    bahut hi badiyaa baat kahi aapne.saarthak rachanaa.badhaai aapko.

    उत्तर देंहटाएं
  18. बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  19. वाह यह भी सुंदर रचना है आपकी.

    उत्तर देंहटाएं
  20. क्यों बैठे गुमसुम उपवन में,
    कलिका बनकर खिलो चमन में,
    नाहक ही होते हो आहत!
    किसने कहा रहो तुम सहमत!!
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ! लाजवाब रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  21. कुमुद-कुमुदिनी खिले पंक में,
    शीतलता होती "मयंक" में,
    दीवानी होती है चाहत!
    किसने कहा रहो तुम सहमत!!

    बहुत सुंदर...

    उत्तर देंहटाएं
  22. कोमल मन पर बोझ लादकर,
    उड़ न सकोगे नीलगगन पर,
    नहीं आपके बस की मेहनत!
    किसने कहा रहो तुम सहमत!!

    आज की रचना वाकई मै अनोखी है शास्त्री जी ?

    उत्तर देंहटाएं
  23. कोमल मन पर बोझ लादकर,
    उड़ न सकोगे नीलगगन पर,
    नहीं आपके बस की मेहनत!
    किसने कहा रहो तुम सहमत!!

    हम तो अपनी बात कहते हैं...सहमत होना जरुरी नहीं...

    उत्तर देंहटाएं
  24. कोमल मन पर बोझ लादकर,
    उड़ न सकोगे नीलगगन पर...

    bahut sunder aur sarthak panktiyaan...

    उत्तर देंहटाएं
  25. "कुमुद कुमुदनी खिले पंक में "बहुत खूब बधाई
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  26. आग दिलों में बनकर बसते,
    अंगारा से खुलकर हँसते,
    कुछ तो दिखला देते हिम्मत!
    किसने कहा रहो तुम सहमत!!

    बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

    उत्तर देंहटाएं
  27. ये तो अपने मन की बात है कोई सहमत न भी हो तो क्या अपनी अभिव्यक्ति बदल जाती है. वह भी कह डालते हैं जो आप नहीं सुनना चाहते.

    उत्तर देंहटाएं
  28. किसने कहा रहो तुम सहमत ... बहुत अच्छे भाव हैं इस सुंदर रचना में । शुभकामनाएँ ।

    उत्तर देंहटाएं
  29. वाह! प्रेरणा जगाती और जोश का संचार करती पंक्तियाँ ! आभार!

    उत्तर देंहटाएं

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