"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

बुधवार, 25 मई 2011

"गीत-रेत के घरौंदे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

सज रहे हैं ख्वाब,
जैसे हों घरौंदे रेत में।
बाढ़-बारिश और हवा पा,
बदल जाते रेत में।।

मोम के सुन्दर मुखौटे,
पहन कर निकले सभी,
बदल लेते रूप अपना,
धूप जब निकली कभी,
अब हुए थाली के बैंगन,
थे कभी जो खेत में।
बाढ़-बारिश और हवा पा,
बदल जाते रेत में।।

हो रही वादाख़िलाफी,
रो रहे सम्बन्ध हैं,
हाट का रुख़ देखकर ही,
हो रहे अनुबन्ध हैं,
नज़र में कुछ और है,
कुछ और ही है पेट में।
बाढ़-बारिश और हवा पा,
बदल जाते रेत में।।

जो स्वयं अज्ञान है,
वो क्या परोसेगा हुनर,
बेग़ैरतों की लाज को,
ढक पाएगी कैसे चुनर,
जिग़र में जो कुछ भरा है,
वही देगा भेंट में।
बाढ़-बारिश और हवा पा,
बदल जाते रेत में।।

25 टिप्‍पणियां:

  1. जो स्वयं अज्ञान है,वो क्या परोसेगा हुनर-
    bilkul sahi kaha hai aapne par aisa hi ho raha hai .

    उत्तर देंहटाएं
  2. हो रही वादाख़िलाफी,
    रो रहे सम्बन्ध हैं,
    हाट का रुख़ देखकर ही,
    हो रहे अनुबन्ध हैं,

    सच को उभारती हुई पंक्तियाँ.

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  3. जो स्वयं अज्ञान है,वो क्या परोसेगा हुनर,
    बेग़ैरतों की लाज को,ढक पाएगी कैसे चुनर,
    जिग़र में जो कुछ भरा है,वही देगा भेंट में।


    बहुत सुंदर और यथार्थ कहा है आपने, जिस अर्थ को समेटे है वह सब की समझ आ जाय तो रूप ही कुछ और हो .

    उत्तर देंहटाएं
  4. शानदार अभिव्‍यक्‍ित

    उत्तर देंहटाएं
  5. हो रही वादाख़िलाफी,
    रो रहे सम्बन्ध हैं,
    हाट का रुख़ देखकर ही,
    हो रहे अनुबन्ध हैं,
    नज़र में कुछ और है,
    कुछ और ही है पेट में।
    बाढ़-बारिश और हवा पा,
    बदल जाते रेत में।।
    क्या बात है शास्त्री जी .....बहुत बढियां

    उत्तर देंहटाएं
  6. जो स्वयं अज्ञान है,
    वो क्या परोसेगा हुनर,
    बेग़ैरतों की लाज को,
    ढक पाएगी कैसे चुनर,
    जिग़र में जो कुछ भरा है,
    वही देगा भेंट में।
    bahut prabhaavshali rachna pesh ki hai aapne.sach ke bahut kareeb.aabhar.

    उत्तर देंहटाएं
  7. नज़र में कुछ और है,
    कुछ और ही है पेट में।
    बाढ़-बारिश और हवा पा,
    बदल जाते रेत में।।
    bilkul sahi kaha aapne .yathart batati hui sunder rachanaa.badhaai aapko.



    please visit my blog and leave the comments also.

    उत्तर देंहटाएं
  8. जो स्वयं अज्ञान है,
    वो क्या परोसेगा हुनर,
    बेग़ैरतों की लाज को,
    ढक पाएगी कैसे चुनर..
    वाह ! बहुत खूब लिखा है आपने! लाजवाब अभिव्यक्ति!

    उत्तर देंहटाएं
  9. जीवन की विसंगतियों को बखूबी बयां करती एक कविता ! आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  10. जो स्वयं अज्ञान है,वो क्या परोसेगा हुनर,.....
    बहुत सुंदर और यथार्थ कहा है आपने

    उत्तर देंहटाएं
  11. जो स्वयं अज्ञान है,
    वो क्या परोसेगा हुनर,
    बेग़ैरतों की लाज को,
    ढक पाएगी कैसे चुनर,

    वाह शास्त्री जी,बहुत सुन्दर!
    गीत की सारी पंक्तियाँ बेजोड़ हैं!

    उत्तर देंहटाएं
  12. जो स्वयं अज्ञान है,वो क्या परोसेगा हुनर-
    मगर आजकल तो वही ज्ञान और हुनर परोस रहे है|

    उत्तर देंहटाएं
  13. हो रही वादाख़िलाफी,
    रो रहे सम्बन्ध हैं,
    हाट का रुख़ देखकर ही,
    हो रहे अनुबन्ध हैं

    बहुत अच्छा लिखा है...

    उत्तर देंहटाएं
  14. हो रही वादाख़िलाफी,
    रो रहे सम्बन्ध हैं,
    हाट का रुख़ देखकर ही,
    हो रहे अनुबन्ध हैं,
    ....
    कटु सत्य को रेखांकित करती बहुत संदर रचना..आभार

    उत्तर देंहटाएं
  15. परम आदरनीय ,डॉ.साहेब "बदल जातें हैं रेतमें ...."रचना पढ़ी सब कुछ रेत में ही बदलना है ये सत्य है .बात केवल स्वीकार करने की रह जाती है सर .अछि रचना के लिए आपको व आपकी कलम को साधुवाद

    उत्तर देंहटाएं
  16. मोम के सुन्दर मुखौटे,
    पहन कर निकले सभी,
    बदल लेते रूप अपना,
    धूप जब निकली कभी
    वाह! बहुत सुंदर प्रयोग।

    उत्तर देंहटाएं
  17. यथार्थ का सुन्दर चित्रण किया है।

    उत्तर देंहटाएं
  18. अब हुए थाली के बैंगन,
    थे कभी जो खेत में।

    इस रंग बदलती दुनिया में आपके ख्वाब ही हकीकत हैं...

    उत्तर देंहटाएं
  19. हाट का रुख देखकर हो रहे अनुबंध हैं ...
    मारक पंक्तियाँ हैं ...

    उत्तर देंहटाएं
  20. क्या बात है,,,बहुत उम्दा!

    उत्तर देंहटाएं
  21. हो रही वादाख़िलाफी,
    रो रहे सम्बन्ध हैं,
    हाट का रुख़ देखकर ही,
    हो रहे अनुबन्ध हैं,
    नज़र में कुछ और है,
    कुछ और ही है पेट में।
    बाढ़-बारिश और हवा पा,
    बदल जाते रेत में।

    बेहद सटीक पंक्तियाँ.

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails