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मंगलवार, 24 मई 2011

"अच्छा हुआ! जो मैं नारि न हुआ!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


अच्छा ही हुआ! जो मैं नारि न हुआ!

(००)
मुझको पुरुष बना कर प्रभु ने,
बहुत बड़ा उपकार किया है।
नर का चोला देकर भगवन,
अनुपम सा उपहार दिया है।
(१) 
नारी रूप अगर देते तो,
अग्नि परीक्षा देनी होती।
बार-बार जातक जनने की,
कठिन वेदना सहनी होती।।
(२) 
चूल्हे-चौके में प्रतिदिन ही,
खाना मुझे बनाना होता।
सबको देकर भोजन-पानी,
मुझे अन्त में खाना होता।।
(३) 
सास-ससुर, और जेठ-ननद की,
झिड़की सुन चुप रहना होता।
केवल दो आँसू टपकाकर,
मन ही मन सब सहना होता।।
(४) 
नारी बनकर तो जीवन की
छिन ही जाती सब आजादी।
इधर-उधर आने-जाने में,
बाधाएँ आड़े आ जाती।।
(५) 
फिर कैसे उन्मुक्तभाव से,
मीठी-मीठी बातें कहते।
कदम-कदम पर पहरे होते,
हरदम सहमे-सहमे रहते।।
(६) 
अपने मन की टीवी-सीडी
और सीरियल देख न पाते।
समाचार उनकी मर्जी के,
देख-देख मन में झुँझलाते।।
(७) 
दाढ़ी-मूछ उगाकर मुख पर,
मर्दाना शृंगार दिया है।।
नर का चोला देकर भगवन,
अनुपम सा उपहार दिया है।

22 टिप्‍पणियां:

  1. वाह आप तो दोनो तरफ़ से बैटिंग करने उतर गये हैं

    उत्तर देंहटाएं
  2. gr8..gr8...gr8...kavita haasya ka safal raspaan karaati hai aur aurat hona kisi mard ke bas ki baat nahi.ye sandesh dene ke liye bhi gr8 ati ati uttam rachna.

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह ! चित भी मेरी और पुट भी मेरी ! वाह शात्री जी क्या नारी श्रृंगार किया है ...
    ' मान गए ..मुगले आजम '...

    उत्तर देंहटाएं
  4. यह भी खूब रही
    कह दीजिये ना री मैं नारी नहीं

    उत्तर देंहटाएं
  5. एक तरफ़ नारी की प्रशंसा और दूसरी तरफ़ अपनी……………दोनो हाथों मे लड्डू रख लिये हैं…………नारियों की तो प्रशंसा मिलेगी ही और पुरुष वर्ग भी खुश्…………इसे कहते हैं लेखन का कमाल्……………ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर्॥

    उत्तर देंहटाएं
  6. वाह ....यहां भी खूब कहा है आपने ...।

    उत्तर देंहटाएं
  7. जो जहाँ है उसकी अपनी उपयोगिता और सार्थकता है....नारी न होकर आपने माँ होने का गौरव खो दिया है !

    उत्तर देंहटाएं
  8. चिट् भी मेरी पट भी मेरी :) ये भी खूब रही.
    सुन्दर गीत.

    उत्तर देंहटाएं
  9. नारी बनकर तो जीवन की
    छिन ही जाती सब आजादी।
    इधर-उधर आने-जाने में,
    बाधाएँ आड़े आ जाती।।
    बिल्कुल सही! बहुत सुन्दर गीत! बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  10. चित भी मेरी , पट भी मेरी ...
    निष्पक्ष होकर देखना , यही तो सच्चे इंसान की विशेषता है !

    उत्तर देंहटाएं
  11. सुन्दर भावपूर्ण रचना .. अच्छा हुआ सर आप खाना बनाने से बच गए ...

    उत्तर देंहटाएं
  12. भारतीय समाज में स्त्रियों की जो दशा है , उसे पुरुष बखूबी जानते हैं, और इसीलिए एक भी पुरुष ऐसा नहीं मिलेगा जो स्त्री बनना चाहेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  13. सुन्दर भावपूर्ण रचना
    मान्यवर ! भारतीय नारी की वेदना को व्यंग के माध्यम से अच्छा प्रस्तुत किया है आपने !
    आशा है की आप इसी तरह पुरुषों की वेदना को भी प्रस्तुत करेंगे !

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  14. बहुत सुन्दरता से संभाला है मामला... :)

    उत्तर देंहटाएं
  15. कुछ भी होने से कुछ लाभ हैं तो कुछ हानि ...आप ज्यादा हानि से बच गए .. अच्छी प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  16. एक पे रहने का भाई...या तो नर हो जाओ या नारी...आदमी चाहे जितना बहादुर बन ले...पर अंत में नारी ही है...चाहे माँ, बहन, बीवी या बेटी...जितनी कठिनाइयों का आपने वर्णन किया है...उन्हें सहने के लिए बड़ा जिगरा चाहिए...हमारे यहाँ नारी शक्ति की उपासना ऐवें ही नहीं होती...आपने उनको शब्द दिए...बहुत बहुत बधाइयाँ...

    उत्तर देंहटाएं

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