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शनिवार, 14 मई 2011

"मक्ता कैसे पाऊँ मैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

कैसे लिखूँ ग़ज़ल का मतला, मक्ता कैसे पाऊँ मैं।
वनवासी दुनिया में कैसे, अपने शेर सजाऊँ मैं।
नहीं रहे अब झाड़ी जंगल, भटक रहा हूँ राहों में,
पात-पात में छुपे शिकारी, कैसे जान बचाऊँ मैं।
आफताब़-महताब़ उन्हीं के, जिनके केवल नाम बड़े,
जालजगत के सिवा शायरी, बोलो कहाँ लगाऊँ मैं।
सोनचिरय्या के सब गहने, छीन लिए गौरय्यों ने,
खर-पतवार भरे खेतों में, कैसे धान उगाऊँ मैं।
पूजा होती रूप रंग की, ज्ञानी याचक-चाकर हैं
लुप्त हुए चाणक्य, कहाँ से सुथरा-शासन लाऊँ मैं।

11 टिप्‍पणियां:

  1. इतने त्यागी मंत्री काश सब हो जायें।

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  2. वाह आज तो दिल खुश हो गया पढकर .
    गज़ब की प्रभावशाली पंक्तियाँ हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  3. आफताब़-महताब़ उन्हीं के, जिनके केवल नाम बड़े,
    जालजगत के सिवा शायरी, बोलो कहाँ लगाऊँ मैं

    खूबसूरत गज़ल

    उत्तर देंहटाएं
  4. bahut kuchh ...nahin,
    sab kuchh kah diya aapne........

    jiyo dada !

    उत्तर देंहटाएं
  5. पूजा होती “रूप” रंग की, ज्ञानी याचक-चाकर हैं
    लुप्त हुए चाणक्य, कहाँ से सुथरा-शासन लाऊँ मैं।
    bahut achcha likhe hain aap.

    उत्तर देंहटाएं
  6. पूजा होती “रूप” रंग की, ज्ञानी याचक-चाकर हैं
    लुप्त हुए चाणक्य, कहाँ से सुथरा-शासन लाऊँ मैं।

    बहुत अच्छी रचना.. दुनिया-जहान, खेत-खलिहान से लेकर शासन तक की बातें एक साथ कह दी आपने.....

    उत्तर देंहटाएं
  7. गज़ब की प्रभावशाली गज़ल| धन्यवाद|

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत बहुत बढ़िया शास्त्री जी ...आपका लिखा एक एक शब्द का अर्थ बहुत गहरा है

    उत्तर देंहटाएं
  9. समाज के लिए साफ़-सटीक सन्देश !
    सामयिक-वातावरण पर तीखा व्यंग्य !

    उत्तर देंहटाएं

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