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सोमवार, 16 मई 2011

"बातें ऊल-जलूल हो गईं..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

जाने कैसे भूल हो गई अन्तर्मन को पढ़ने में।
कल्पनाएँ निर्मूल हो गईं, पाषाणों को गढ़ने में।

हार नहीं मानी मैंने, संघर्षों के तूफानों से,
राहें ही प्रतिकूल हो गईं, सोपानों को चढ़ने में।

उठती-गिरती लहरों से, नौका को सदा बचाया है,
भरी जवानी धूल हो गई, तूफानों से लड़ने में।

आगत और अनागत का स्वागत मैं दिल से करता हूँ,
नदियाँ सूखी गूल हो गई, अरमानों को मढ़ने में।

रूपकभी भी रास न आया, नादानों को फूलों का,
बातें ऊल-जलूल हो गईं, गुलदानों को जड़ने में।

27 टिप्‍पणियां:

  1. " जाने केसे भूल हो गई अंतर्मन को पढने में ! "

    कभी -कभी न चाहते हुए भी इंसान गलती कर बैठता है ..पर क्षमा कई गलतियों की दवा है .परस्थितियो को प्रतिकूल करने के लिए ...क्षमा करना ही बडप्पन की निशानी है .....

    उत्तर देंहटाएं
  2. shaastri ji ke prvachan pdh kar mugaambo roz khush ho rahaa hai bhtrin jzbaati lekhn ke liyen bdhaai .akhtar khan akela kota rajsthan

    उत्तर देंहटाएं
  3. “रूप” कभी भी रास न आया, नादानों को फूलों का

    हमें तो यह 'रूप' आपका बहुत पसंद आया
    शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  4. आज तो यूं लग रहा है जैसे कोई काँटा दिल मे चुभा है…………वैसे रचना तो लाजवाब है ही।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. ओह ..कुछ मार्मिक सी हो गई अभिव्यक्ति.
    सुन्दर रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  7. आज किसी को फिर दुःख पहुंचा ,
    लगता है मुझसे भूल हो गई !
    सुंदर रचना !

    उत्तर देंहटाएं
  8. हार नहीं मानी मैंने, संघर्षों के तूफानों से,
    राहें ही प्रतिकूल हो गईं, सोपानों को चढ़ने में।
    गीत की व्यंजना दिल को छूती है !
    हर पंक्ति में भावों की कसावट साफ़ झलक रही है !
    आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  9. हार नहीं मानी मैंने, संघर्षों के तूफानों से,
    राहें ही प्रतिकूल हो गईं, सोपानों को चढ़ने में।
    bahut hi sunder ghazal likhi hai.umdaa ghazal.

    उत्तर देंहटाएं
  10. हार नहीं मानी मैंने, संघर्षों के तूफानों से,
    राहें ही प्रतिकूल हो गईं, सोपानों को चढ़ने में।



    इसके लिए तो यही कहूँगी --

    वह पथ क्या पथिक सफलता क्या, जब पथ में बिखरे शूल न हो,
    नाविक की धैर्य कुशलता क्या, जब धाराएँ प्रतिकूल न हो.

    उत्तर देंहटाएं
  11. उठती-गिरती लहरों से, नौका को सदा बचाया है,
    भरी जवानी धूल हो गई, तूफानों से लड़ने में ..

    वाह ... नमस्कार शास्त्री जी .... मधुर गीत है ..मन के भावों का संगम ...

    उत्तर देंहटाएं
  12. कहीं कोई दर्द उठा है अभी.....

    उत्तर देंहटाएं
  13. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 17 - 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  14. हार नहीं मानी मैंने, संघर्षों के तूफानों से,
    राहें ही प्रतिकूल हो गईं, सोपानों को चढ़ने में।

    यही जज्बा होना चाहिए....
    बहुत सुंदर....

    उत्तर देंहटाएं
  15. उठती-गिरती लहरों से, नौका को सदा बचाया है,
    भरी जवानी धूल हो गई, तूफानों से लड़ने में।

    ना चाहते हुए भी कभी कभी ऐसा हो जाता है
    जिसके लिए ये मन तैयार नहीं होता ...आपकी लेखनी का जवाब नहीं है भाई जी
    बहुत उम्दा लिखा है आपने

    उत्तर देंहटाएं
  16. यू ही जूझता रहे जीवन, बड़ी सुन्दर कविता।

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  17. राहें ही प्रतिकूल हो गईं, सोपानों को चढ़ने में।
    जीवन से जुड़ी हुई रचना
    बहुत सुन्दर .. लयमय

    उत्तर देंहटाएं
  18. कभी पत्थर की लकीर हुआ करतीं थीं...अब बातों का अर्थ नहीं रह गया...कथनी और करनी में अंतर हो तो शब्दों का क्या मतलब...आजकल सर्वत्र ये ही देखने को मिल रहा है...बेहद संवेदनशील रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  19. जाकल्पनाएँ निर्मूल हो गईं, पाषाणों को गढ़ने में।
    ने केसे भूल हो गई अंतर्मन को पढने में
    सुन्दर भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  20. जीवन जीने का सलीका सिखाती एक सशक्त रचना .....सादर !

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  21. प्रशंसनीय प्रस्तुति ! आभार

    उत्तर देंहटाएं
  22. गुल और गुलदान वाला प्रयोग बहुत ही बेहतरीन लगा .एक से बढ़कर एक बिम्ब और उनका आखिर तक निर्वाह किया है आपने इस कृति में .एक पंक्ति आपकी जिजीविषा और संघर्ष को समर्पित -"मैंने मानव को पूजा है पाषाणों से प्यार नहीं है ."पूर्ती इसकी आप कीजिये शाश्त्रीजी मयंक -होके निशंक !

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  23. मन के भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  24. कभी -कभी न चाहते हुए भी ऐसी गलती हो जाती है जिनका पता बाद मैं चलता है

    उत्तर देंहटाएं

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