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नदी शारदा में किया, उत्सव
का इसनान।
फिर खिचड़ी खाकर किया, मेले
को प्रस्थान।।
झनकइया वन में लगा, मेला
बहुत विशाल।
वियाबान के बीच में, बिकता
सस्ता माल।।
![]()
यहाँ सिँघाड़े बिक रहे, गुब्बारों
की धूम।
मस्ती में-उल्लास में, लोग
रहे हैं घूम।।
आदिवासियों ने यहाँ, डेरा
दिया जमाय।
जंगल में मंगल किया, पिकनिक
रहे मनाय।।
![]()
बहुत करीने से सजा, चाऊमिन
का नीड़।
जिसको खाने के लिए, लगी
बहुत है भीड़।।
फल के ठेले हैं यहाँ, फूलों
की दूकान।
मनचाहा रँग छाँट लो, रंगों
की है खान।।
गरमा-गरम जलेबियाँ, और
पकौड़ी खाय।
मेला घूमों शान से, हज़म
सभी हो जाय।।
सब्जी बिकती धान से, दाम
नहीं है पास।
बिन पैसे के हो रहा, मेला
आज उदास।।
ऊँचे झूले लगे हैं, भाँति-भाँति
के खेल।
सर्कस के इस खेल मे, भारी
धक्का-पेल।।
घर के दाने बिक रहे, बच्चों
का है साथ।
महँगाई की मार से, बिगड़
रहे हालात।।
आओ अब घर को चलें, घिर
आई है शाम।
जालजगत पर अब हमें, करना
है कुछ काम।।
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शनिवार, 4 नवंबर 2017
"सब्जी बिकती धान से, दाम नहीं है पास" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बुधवार, 5 नवंबर 2014
"गंगा स्नान-तीन पत्थरों का चूल्हा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
"गंगा-स्नान"
आज कार्तिक
पूर्णिमा का दिन है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने का प्रचलन पौराणिक-काल
से ही हमारे देश में चला आ रहा है। अतः परम्परा का निर्वहन करने के लिए हम भी
"माँ पूर्णागिरि" के पद पखार रही शारदी नदी के किनारे जा पहुँचे। यह
पावन स्थल था- "बूम"। जो उत्तराखण्ड के चम्पावत जिले में टनकपुर से 12 किमी दूर पहाड़ों के ठीक नीचे है।
चित्र में
दिखाई दे रहे पर्वत की चोटी पर सती-माता "माँ पूर्णागिरि" का निवास है
और उसके ठीक नीचे पावन शारदा नदी की जल-धारा कल-कल निनाद करती हुई श्रद्धालुओं
को पवित्र स्नान का निमन्त्रण दे रही है।
यहाँ भगवान के
प्रिय फल "बेल" के पेड़ों के मध्य हमलोगों ने भी दो-तीन बेड-शीट बिछा
कर अपना आसन जमा दिया।
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इसके बाद पावन
जल में डुबकी लगाने के लिए पावन शारदा नदी की ओर प्रस्थान किया।
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महिलाओं ने तीन
पत्थरों का चूल्हा बनाया और खिचड़ी बनानी शुरू कर दी।
इसके बाद सबने
बैठकर बड़े प्रेम से खिचड़ी खाई।
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दही, अचार-चटनी और सिरके वाली मूली के साथ खिचड़ी में
छप्पन-भोग का जैसा परमानन्द प्राप्त हुआ।
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इसके बाद
मजेदार घर-परिवार की बातें हुईं और इन बेल के पेड़ों की शीतल छाया में एक घण्टा
विश्राम किया गया।
अब पिकनिक पूरी
हो गई थी और घर वापिस आने की भी जल्दी थी क्योंकि ब्लॉगिंग की तलब लग रही थी।
लौटते हुए
चकरपुर के घने जंगलों मे स्थित "श्री वनखण्डी महादेव" के मन्दिर मे
जाकर भोले बाबा के दर्शन किये।
शिवरात्रि की
रात को यहाँ पर स्थित कैलाशपति की पिण्डी सात बार अपना रंग बदलती है।
इसकी चर्चा
किसी और दिन अलग से पोस्ट लगाकर किया जायेगा।
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बुधवार, 28 नवंबर 2012
"कार्तिक पूर्णिमा-गंगा स्नान" ( डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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