-- प्राणवायु का पेड़ ही, होते हैं आधार। पेड़ लगाकर कीजिए, धरती का सिंगार।। -- पेड़ लगाना भूमि पर, मानव का है कर्म। पर्यावरण सुधारना, हम सबका है धर्म।। -- हरितक्रान्ति से ही मिटे, धरती का सन्ताप। पर्यावरण बचाइए, बचे रहेंगे आप।। -- पेड़ भगाते रोग को, बनकर वैद्य-हकीम। प्राणवायु देते हमें, बरगद, पीपल-नीम।। -- कहने से वातावरण, होगा नहीं पवित्र। धरा बचाने के लिए, वृक्ष लगाओ मित्र।। -- जागरूक होगा नहीं, जब तक हर इंसान। हरा-भरा तब तक नहीं, भू का हो परिधान।। -- कंकरीट जबसे बना, जीवन का आधार। तबसे पर्यावरण की, हुई करारी हार।। -- पेड़ कट गये भूमि के, बंजर हुई जमीन। प्राणवायु घटने लगी, छाया हुई विलीन।। -- नैसर्गिक अनुभाव का, होने लगा अभाव। दुनिया में होने लगे, मौसस में बदलाव।। -- |
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सोमवार, 5 जून 2023
दोहे "पर्यावरण बचाइए, बचे रहेंगे आप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बुधवार, 5 जून 2019
दोहे "धरती का शृंगार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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कंकरीट जबसे बना, जीवन का आधार।
तबसे पर्यावरण की, हुई करारी हार।२।
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पेड़ कट गये धरा के, बंजर हुई जमीन।
प्राणवायु घटने लगी, छाया हुई विलीन।३।
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नैसर्गिक अनुभाव का, होने लगा अभाव।
दुनिया में होने लगे, मौसस में बदलाव।४।
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शस्य-श्यामला धरा को, किया प्रदूषित आज।
कुदरत से खिलवाड़ अब, करने लगा समाज।५।
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नकली सुमनों में नहीं, होता है मकरन्द।
कृत्रिमता में है नहीं, जीवन का आनन्द।६।
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जबसे जंगल में बिछा, कंकरीट का जाल।
धरती पर आने लगे, चक्रवात-भूचाल।७।
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पर्यावरण बचाइए, धरती कहे पुकार।
पेड़ लगाकर कीजिए, धरती का शृंगार।८।
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एक साल में एक दिन, होती जय-जयकार।
पर्यावरण दिवस कहाँ, होगा फिर साकार।९।
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मंगलवार, 5 जून 2018
दोहे "वृक्ष लगाओ मित्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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पेड़ लगाना धरा पर, मानव का है कर्म।
पर्यावरण सुधारना, हम
सबका है धर्म।।
हरितक्रान्ति से मिटेगा, धरती
का सन्ताप।
पर्यावरण बचाइए, बचे
रहेंगे आप।।
प्राणवायु का पेड़ ही, होते हैं
आधार।
पेड़ लगाकर कीजिए, धरती
का सिंगार।।
पेड़ भगाते रोग को, बनकर वैद्य-हकीम।
प्राणवायु देते हमें, बरगद, पीपल-नीम।।
कहने से वातावरण, होगा नहीं पवित्र।
धरा बचाने के लिए, वृक्ष लगाओ
मित्र।।
जागरूक होगा नहीं, जब तक हर इंसान।
हरा-भरा तब तक नहीं, भू का
हो परिधान।।
कंकरीट जबसे बना, जीवन
का आधार।
तबसे पर्यावरण की, हुई
करारी हार।।
पेड़ कट गये धरा के, बंजर
हुई जमीन।
प्राणवायु घटने लगी, छाया
हुई विलीन।।
नैसर्गिक अनुभाव का, होने
लगा अभाव।
दुनिया में होने लगे, मौसस
में बदलाव।।
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शुक्रवार, 5 जून 2015
दोहे "विश्व पर्यावरण दिवस" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]()
एक साल में एक दिन, होती जय-जयकार।
पर्यावरण दिवस कहाँ, होगा फिर साकार।१।
--
कंकरीट जबसे बना, जीवन का आधार।
तबसे पर्यावरण की, हुई करारी हार।२।
--
पेड़ कट गये धरा के, बंजर हुई जमीन।
प्राणवायु घटने लगी, छाया हुई विलीन।३।
--
नैसर्गिक अनुभाव का, होने लगा अभाव।
दुनिया में होने लगे, मौसस में बदलाव।४।
--
शस्य-श्यामला धरा को, किया प्रदूषित आज।
कुदरत से खिलवाड़ अब, करने लगा समाज।५।
--
नकली सुमनों में नहीं, होता है मकरन्द।
कृत्रिमता में खोजता, मनुज आज आनन्द।६।
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जहर बेंचकर लोग अब, लगे बढ़ाने कोष।
औरों के सिर मढ़ रहा, अपने सारे दोष।७।
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ओछे कर्मों से हुए, हम कितने मजबूर।
आज मजे से दूर हैं, कृषक और मजदूर।८।
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जबसे जंगल में बिछा, कंकरीट का जाल।
धरती पर आने लगे, चक्रवात-भूचाल।९।
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पर्यावरण बचाइए, धरती कहे पुकार।
पेड़ लगाकर कीजिए, धरती का शृंगार।१०।
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