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चाँद दिखाई दिया दूज का,
फिर से रात हुई उजियाली।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।
भर सोलह सिंगार धरा ने,
फिर से अपना रूप निखारा।
सजनी ने साजन की खातिर,
सावन में तन-बदन सँवारा।
आँगन-कानन में बरसी है,
बारिश बनकर आज मवाली।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।
आँगन के कट गये पेड़ सब,
पड़े हुए झूले घर-घर में।
झूल रहीं खुश हो बालाएँ,
गूँज रहे मल्हार नगर में।
मस्त फुहारें लेकर आयी,
नभ पर छाई बदरी काली।।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।
उपवन में कोमल कलियों की,
भीग रही है चूनर धानी।
खेतों में लहराते बिरुए,
आसमान का पीते पानी।
पुरवय्या के झोंखे आते,
बल खाती पेड़ों की डाली।।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।
घेवर-फेनी और जलेबी,
अच्छी लगती चौमासे में।
लेकिन अब त्यौहार हमारे,
हैं मँहगाई के फाँसे में।
खास आदमी मजे उड़ाते,
जेब आम की बिल्कुल खाली।।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।
शर्माया-सकुचाया सा,
उग आया चाँद गगन में।
आया है त्यौहार तीज का,
हर्ष समाया मन में।
महिलाएँ आँगन उपवन में ,
झूल रहीं होकर मतवाली।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।
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शनिवार, 3 अगस्त 2019
गीत आया है त्यौहार तीज का" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शनिवार, 6 अगस्त 2016
गीत "महिलाएँ आँगन उपवन में झूल रहीं होकर मतवाली" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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चाँद दिखाई दिया दूज का,
फिर से रात हुई उजियाली।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।
भर सोलह सिंगार धरा ने,
फिर से अपना रूप निखारा।
सजनी ने साजन की खातिर,
सावन में तन-बदन सँवारा।
आँगन-कानन में बरसी है,
बारिश बनकर आज मवाली।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।
आँगन के कट गये पेड़ सब,
पड़े हुए झूले घर-घर में।
झूल रहीं खुश हो बालाएँ,
गूँज रहे मल्हार नगर में।
मस्त फुहारें लेकर आयी,
नभ पर छाई बदरी काली।।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।
उपवन में कोमल कलियों की,
भीग रही है चूनर धानी।
खेतों में लहराते बिरुए,
आसमान का पीते पानी।
पुरवय्या के झोंखे आते,
बल खाती पेड़ों की डाली।।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।
घेवर-फेनी और जलेबी,
अच्छी लगती चौमासे में।
लेकिन अब त्यौहार हमारे,
हैं मँहगाई के फाँसे में।
खास आदमी मजे उड़ाते,
जेब आम की बिल्कुल खाली।।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।
शर्माया-सकुचाया सा,
उग आया चाँद गगन में।
आया है त्यौहार तीज का,
हर्ष समाया मन में।
महिलाएँ आँगन उपवन में ,
झूल रहीं होकर मतवाली।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।
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सोमवार, 17 अगस्त 2015
‘‘तीजो का आया त्यौहार, चलो झूला झूलेंगे’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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सावन की आई बहार, चलो झूला झूलेंगे।
पड़ने लगी हैं फुहार, चलो झूला झूलेंगे।।
बागों में कुहु-कुहु, बोले कोयलिया,
जियरा में अगन लगाये बदलिया,
गायेंगे मेघ-मल्हार, चलो झूला झूलेंगे।
पड़ने लगी है फुहार, चलो झूला झूलेंगे।।
![]()
मेंहदी रचाओ और गजरा सजाओ,
कजरारे नयनों में, कजरा लगाओ,
चूनर को लेना सँवार, चलो झूला झूलेंगे।
पड़ने लगी हैं फुहार, चलो झूला झूलेंगे।।
खेतों में धनवा की सोंधी महक है,
तालों में पनिया की चंचल चहक है,
शीतल चलत है बयार, चलो झूला झूलेंगे।
पड़ने लगी हैं फुहार, चलो झूला झूलेंगे।।
हरी-हरी धरती, हरी-हरी चुडियाँ,
चहकीं हैं बुढ़िया, महकी हैं कुड़ियाँ,
तीजो का आया त्यौहार, चलो झूला झूलेंगे।
पड़ने लगी हैं फुहार, चलो झूला झूलेंगे।।
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रविवार, 22 जुलाई 2012
"आई तीजो हरियाली" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शुरू हुए रमजान मुकद्दस, आई तीजो हरियाली।। अब आँगन में नहीं, पड़े छत के कुण्डे में झूले हैं, सखियों के संग झूलीं बाला, मन खुशियों से फूले हैं, मेंहदी रची हथेली, अधरों पर लगती प्यारी लाली। शुरू हुए रमजान मुकद्दस, आई तीजो हरियाली।। मेघ-मल्हारों के गानों से, चहका है घर और आँगन, सोंधी-सोंधी गन्ध समायी, महका सारा वन-उपवन, पुरवय्या के झोंके पाकर, झूम रही डाली-डाली। शुरू हुए रमजान मुकद्दस, आई तीजो हरियाली।। बैठी हुई घरों में अपने, बुलबुल गातीं राग मधुर, लहराते हैं धान खेत में, झींगुर बजा रहे नूपुर, टर्र-टर्र मेढक चिल्लाते, घटा देख काली-काली। शुरू हुए रमजान मुकद्दस, आई तीजो हरियाली।। परदेसों में साजन जिनके, उनको विरह सताता है, रिमझिम मस्त फुहारों वाला, पानी आग लगाता है, भँवरों का मीठी गुंजन भी, लगती जैसे हो गाली। शुरू हुए रमजान मुकद्दस, आई तीजो हरियाली।। |
"भइया मुझे झुलाएगा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
यह बालरचना गतवर्ष 29 जुलाई को लिखी थी। आज पुनः आप सबसे साझा कर रहा हूँ! ![]() अब हरियाली तीज आ रही, मम्मी मैं झूलूँगी झूला। देख फुहारों को बारिश की, मेरा मन खुशियों से फूला।। कई पुरानी भद्दी साड़ी, बहुत आपके पास पड़ी हैं। इतने दिन से इन पर ही तो, मम्मी मेरी नजर गड़ी हैं।। |
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