सज्जनता बेहोश हो गई, दुर्जनता पसरी आँगन में। कोयलिया खामोश हो गई, मैना चहक रहीं उपवन में।। |
गहने तारे, कपड़े फाड़े, लाज घूमती बदन उघाड़े, यौवन के बाजार लगे हैं, नग्न-नग्न शृंगार सजे हैं, काँटें बिखरे हैं कानन में। मैना चहक रहीं उपवन में।। |
मानवता की झोली खाली, दानवता की है दीवाली, चमन हुआ बेशर्म-मवाली, मदिरा में डूबा है माली, दम घुटता है आज वतन में। मैना चहक रहीं उपवन में।। |
शीतलता रवि ने फैलाई, पूनम ताप बढ़ाने आई, बेमौसम में बदली छाई, धरती पर फैली है काई, दशा देख दुख होता मन में। मैना चहक रहीं उपवन में।। |
सुख की खातिर पश्चिमवाले, आते थे होकर मतवाले, आज रीत ने पलटा खाया, हमने उल्टा पथ अपनाया, खोज रहे हम सुख को धन में। मैना चहक रहीं उपवन में।। |
शावक सिंह खिलाने वाले, श्वान पालते बालों वाले, बौने बने बड़े मनवाले, जो थे राह दिखाने वाले, भटक गये हैं बीहड-वन में। मैना चहक रहीं उपवन में।। |
