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मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012
"सपनों की कसक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
रविवार, 7 अगस्त 2011
"दिल से दिल मिल जाने पर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
दिल से दिल मिल जाने पर। सच्चे सब सपने हो जाते, दिवस सुहाने आने पर।। सूरज की क्या बात कहें, चन्दा भी आग उगलता है, साथ छोड़ जाती परछाई, गर्दिश के दिन आने पर। दूर-दूर से अच्छे लगते वन-पर्वत, बहती नदियाँ, कष्टों का अन्दाज़ा होता, बाशिन्दे बन जाने पर। पानी से पानी की समता, कीचड़ दाग लगाती है, साज और संगीत बताता, सुर को ग़लत लगाने पर। हर पत्थर हीरा नहीं होता, ध्यान हमेशा ये रखना, सोच-समझकर निर्णय लेना, रत्नों को अपनाने में। जो सुख-दुख में सहभागी हों, वो मिलते हैं किस्मत से, स्वर्ग, नर्क सा लगने लगता, मन का मीत न पाने पर। सच्चे सब सपने हो जाते, दिवस सुहाने आने पर।। |
शुक्रवार, 6 मई 2011
"मेरे मन को भाते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
वो अनजाने से परदेशी! मेरे मन को भाते हैं। भाँति-भाँति के कल्पित चेहरे, |
पतझड़ लगता है वसन्त, वीराना भी लगता मधुबन, जब वो घूँघट में से अपनी, मोहक छवि दिखलाते हैं। भाँति-भाँति के कल्पित चेहरे, |
गाने लगता भँवरा गुंजन, शोख-चटक कलिका बनकर, वो उपवन में मुस्काते हैं। भाँति-भाँति के कल्पित चेहरे, सपनों में घिर आते हैं।। |
होती उनकी चमक निराली, आसमान की छाती पर, जब काले बादल छाते हैं। भाँति-भाँति के कल्पित चेहरे, सपनों में घिर आते हैं।। |
अँखियाँ देतीं मौन निमन्त्रण, बिन पाती का है आमन्त्रण, सपनों की दुनिया को छोड़ो, मन से तुम्हे बुलाते हैं। भाँति-भाँति के कल्पित चेहरे, |
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