मौसम ने है बहुत रुलाया।
आसमान में बादल छाया।।
सूरज ने अवकाश लिया है,
सर्दी फिर से वापिस आयी।
पीछा नहीं छोड़ती अब भी,
कम्बल-लोई और रजायी।
ऊनी कपड़ें में भी अब तो,
काँप रही ठिठुरन से काया।
आसमान में बादल छाया।।
बिजली करती आँख-मिचौली,
हीटर पड़े हुए हैं ठण्डे।
बाजारों से लकड़ी गायब,
नहीं सुलभ हैं उपले-कण्डे।
चमक-चमककर, कड़क-कड़ककर,
घनचपला ने बहुत डराया।
आसमान में बादल छाया।।
अभी बहुत कुहरा आता है,
वासन्ती परिवेश नहीं है।
गर्मी नहीं अभी धूप में पूरी,
यौवन चढ़ा दिनेश नहीं है।
मजबूरी में दादा जी ने,
तसले में अलाव सुलगाया।
आसमान में बादल छाया।।
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शुक्रवार, 31 जनवरी 2014
"आसमान में बादल छाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बुधवार, 14 दिसंबर 2011
रविवार, 11 दिसंबर 2011
"झीना-झीना उजियारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
कल केवल कुहरा आया था, अब बादल भी छाया है। हाय भयानक इस सर्दी ने, सबका हाड़ कँपाया है।। भीनी-भीनी पड़ी फुहारें, झीना-झीना उजियारा। आग सेंकता सरजू दादा, दिन में छाया अँधियारा। कॉफी और चाय का प्याला, सबसे ज्यादा भाया है।। आलू और शकरकन्दी भी, सबके मन को भाते हैं। गर्म-गर्म गाजर का हलवा, खुश होकर सब खाते हैं। कम्बल-लोई और कोट से, कोमल बदन छिपाया है।। हीटर-गीजर और अँगीठी, गज़क, रेवड़ी-मूँगफली। गर्म समोसे, टिक्की-डोसा, अच्छी लगती हैं इडली। मौसम के अनुकूल बया ने, सुन्दर नीड़ बनाया है।। |
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