सरकार से किया किनारा
बंसल की पैंठ
सोनिया का इशारा
मनमोहन का सहारा
बन गये मन्त्री
हो गये ठाठ
रिश्तेदार और सन्तरी
करने लगे बन्दरबाँट
--
बकरे की माँ
कब तक खैर मनाती
घूस आखिर
कब तक छिप पाती?
--
मन्त्री के नाती
रँगे हाथ पकड़े गये
खुफिया तन्त्र के
जाल में जकड़े गये
--
पटरी से रेल
बिगड़ने लगा
बना बनाया खेल
चक्के होने लगे जाम
तो जपने लगे
मनमोहन का नाम
--
याद आया बकरा
लाओ जल्दी से कोई भी
काला-सफेद या चितकबरा
करो पूजा पाठ
और कर दो हलाल
शायद हो जाये
कुछ कमाल!
--
लेकिन बकरे की
आह लायी रंग
दीवाली को रास न आया
होली का रंग और ढंग
सोनिया ने पूछा
पी.एम. से-
तब कहीं जाकर
विदा किया मनमोहन ने
बंसल को बेमन से!
--
लेकिन दूसरा चेहरा
लायें कहाँ से?
कोयले की खान में
सब काले ही काले हैं
रिश्वत लेने के लिए
सभी के जीजा हैं
और सभी के साले हैं....!
बकरा तो
शहीद हो गया
लेकिन जाते-जाते
श्राप दे गया
हम तो डूबे हैं सनम
तुमको भी ले डूबेंगे
.......! |
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शनिवार, 11 मई 2013
"बलि का बकरा...कौन...?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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