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अब
तो लालकिला भी खुलकर उनकी बोली बोल रहा।।
पहले
भूल करी तो भारत सदियों तक परतन्त्र रहा,
खण्ड-खण्ड
हो गया देश, लेकिन बिगड़ा जनतन्त्र रहा,
पुनः
गुलामी का ख़तरा भारत के सिर पर डोल रहा।
अब
तो लालकिला भी खुलकर उनकी बोली बोल रहा।।
जिसने
बैठाया आसन पर, वो ही धूल चटा देगी,
जुल्मी-शासक
का धरती से, नाम-निशान मिटा देगी,
छल
की लिए तराजू क्यों जनता का धीरज तोल रहा।
अब
तो लालकिला भी खुलकर उनकी बोली बोल रहा।।
खेल
रहा है खेल घिनौना, जन-गण के मत को पाकर,
हित
स्वदेश का बिसराया है, सत्ता के मद में आकर,
ईस्ट
इण्डिया के दरवाजे फिर से घर में खोल रहा।
अब
तो लालकिला भी खुलकर उनकी बोली बोल रहा।।
आजादी
का अर्थ भूलकर, स्वछन्दता
मन को भाई.
अपनाकर
अंग्रेजी, अपनी हिन्दी भाषा बिसराई,
जटा
खोलकर शंकर क्यों गंगा में विष को घोल रहा।
अब
तो लालकिला भी खुलकर उनकी बोली बोल रहा।।
देशी रग में खून विदेशी, पाया "रूप" सलोना है.
इनकी नज़रों में स्वदेश का, आम नागरिक बौना है,
रंगे स्यार को देख, लहू सारी जनता का खौल रहा।
अब तो लालकिला भी खुलकर उनकी बोली बोल रहा।।
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सोमवार, 24 सितंबर 2012
"जनता का धीरज डोल रहा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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