![]() किसने अश्रु भरे सागर में, पानी सब नमकीन हो गया। नीलगगन में उड़ता बादल, क्यों इतना ग़मग़ीन हो गया? मैदानों से आकर नदियाँ, तुझको जल से पोषित करतीं। कलकल-छलछल, करती आतीं, खुश होकर तेरा तन भरतीं। फिर क्यों उनका मीठा पानी, खारा और मलीन हो गया।। रजनी में नभ की आँखों से, शबनम की कुछ बून्द टपकतीं। सुबह-सवेरे हरित पात पर, मोती जैसी खूब चमकतीं। सूरज की किरणों को पाकर, सब अस्तित्व विलीन हो गया।। रत्नों का लालच सबको है, लेकिन हाथ नहीं आते हैं। अमृत की चाहत में गागर, खारे जल से भर लाते हैं। जीवन की आपाधापी में, लक्ष्य बहुत संगीन हो गया।। |
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मंगलवार, 17 अप्रैल 2012
"लक्ष्य बहुत संगीन हो गया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मंगलवार, 20 मार्च 2012
"गरल भरा हमने गागर में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
गरल भरा हमने गागर में। कैसे प्यास बुझेगी मन की, खारा जल पाया सागर में।। कथा-कीर्तन और जागरण, रास न आये मेरे मन को। आपाधापी की झंझा में, होम कर दिया इस जीवन को। वन का पंछी डोल रहा है, भिक्षा पाने को घर-घर में। कैसे प्यास बुझेगी मन की, खारा जल पाया सागर में।। आज धरा-रानी के हमने, लूट लिए सारे आभूषण। नंगे पर्वत, सूखे झरने, अट्टहास करता है दूषण। नहीं जवानी और रवानी, कायरता है नर-नाहर में। कैसे प्यास बुझेगी मन की, खारा जल पाया सागर में।। खनन बढ़ा है, खनिज घटे हैं, नकली मिलते आज रसायन। हारे का हथियार बचा है, गीता-रामायण का गायन। कैसे ओढ़ूँ और बिछाऊँ, सिमटा हूँ छोटी चादर में। कैसे प्यास बुझेगी मन की, खारा जल पाया सागर में।। |
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