अँगरेजी भी है लचर,
हिन्दी भी कमजोर।।
अँगरेजी का हो रहा,
भारत में परित्राण।
नौकरशाहों के चले. निज
भाषा पर बाण।।
शब्दों का अम्बार है, लेकिन
है उलझाव।
आते मस्तक में नहीं,
अब तो नूतन भाव।।
लिखता कविता-दोहरे,
रचता रहता गीत।
चौथेपन में कर रहा,
अपना समय व्यतीत।।
लोगों ने अब कर दिये, नंगे
सभी पहाड़।
देवभूमि के चमन में, दिखने
लगा उजाड़।।
पर्वत का वातावरण, अब
तो हुआ खराब।
लोग धड़ल्ले से यहाँ, पीने लगे शराब।।
अब भाषा के नाम पर, होने
लगा मखौल।
शोर-शराबे से हुआ,
दूषित अब माहौल।।
|
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शुक्रवार, 13 सितंबर 2019
दोहे हिन्दीदिवस "दिखने लगा उजाड़" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शनिवार, 14 सितंबर 2013
"चौदह सितम्बर-चौदह दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]()
हिन्दी का दिन बन गया, जग में आज मखौल।
अंग्रेजी के भक्त अब, बजा रहे हैं ढोल।१।
हिन्दी-डे कहने लगे, अब तो नौकरशाह।
मन में इनके है नहीं, हिन्दी की कुछ
चाह।२।
आन-बान-अभिमान का, मिटा रहे अस्तित्व।
मनमोहन की तान का, बिगड़ा हुआ घनत्व।३।
सूरज जब खाने लगे, खुद ही अपनी धूप।
अँधियारे को चीर कर, कैसे निखरे रूप।४।
स्वर-व्यंजन में रमा है, रूप और
विज्ञान।
अपनी भाषा का करें, आओ हम गुणगान।५।
कभी न थमने पायेगी, सन्तों की आवाज।
मानस को श्रीराम की, पढ़ता रोज समाज।६।
युगों-युगों से चल रहे, खण्ड-काल और
कल्प।
देवनागरी का नहीं, दूजा कोई विकल्प।७।
अपनी हिन्दी में निहित, जीवन का सब
सार।
सन्तों के उपदेश पर, कर लो तनिक विचार।८।
काव्यशास्त्र में खूब है, छन्दों की
भरमार।
सरस-सरल है तरल भी, अलंकार बौछार।९।
गद्य-पद्य से युक्त है, हिन्दी का
साहित्य।
हिन्दी के परिवेश में, भरा हुआ
लालित्य।१०।
उद्गम जिसमें प्रीत का, जीवन का है
सार।
सारे जग को बाँटिए, हिन्दी का उपहार।११।
तुलसी-सूर-कबीर से, हुए न अब तक भक्त।
हिन्दी के उत्थान में, सदा रहे
अनुरक्त।१२।
हिन्दी के प्रताप से, देश हुआ स्वाधीन।
फिर किस कारण से हुई, अपनी भाषा
क्षीण।१३।
अपने प्यारे देश में, समझो तभी सुराज।
अपनी भाषा में करे, जब हम अपने काज।१४।
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शुक्रवार, 13 सितंबर 2013
"हिन्दी को बिसराया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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गौरय्या का नीड़, चील ने हथियाया है
हलो-हाय का पाठ मातमी समझाया है
जाल बिछाया अपना, छीनी है हिन्दी की बिन्दी
अपने घर में हुई परायी, अपनी भाषा हिन्दी
खोटे सिक्के से लोगों को बहलाया है
हिन्दीभाषा से हमने, भारत को मुक्त कराया था
हिन्दी में मत माँगे थे, सत्ता का आसन पाया था
लेकिन गद्दी पाते ही हिन्दी को बिसराया है
चीन और जापान आज भाषा के बल पर आगे
किन्तु हमारे खेवनहारे नहीं नींद से जागे
खाया अपना, राग विदेशी अपनाया है
विश्वपटल पर कैसे होगी, अब पहचान हमारी
वाणी क्यों हो गयी विदेशी, ऐसी क्या लाचारी
पुरखों का अभिमान और सम्मान गँवाया है
अन्धे-गूँगे-बहरों को क्या अपनी व्यथा सुनायें
हुक्मरान हिन्दी के दिन को हिन्दी-डे बतलाएँ
मोहक हलवा-पूड़ी छोड़ा, पिज्जा-बर्गर खाया है
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शुक्रवार, 14 सितंबर 2012
"हिन्दी दिवस पर दो गीत" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
हिन्दीदिवस पर सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएँ! इस अवसर पर प्रस्तुत हैं दो गीत! (१) हिन्दीभाषा को अपनायें। आओ हिन्दीदिवस मनायें।। हिन्दीवालों की हिन्दी ही- क्यों इतनी कमजोर हो गयी? भाषा डूबी अंधियारे में, अंग्रेजी की भोर हो गई। एक वर्ष में पन्द्रह दिन ही- हिन्दी की गाथा को गायें। आओ हिन्दीदिवस मनायें।१। चीरहरण करते भाषा का, ये काले अंग्रेज निरन्तर। भेद-भाव की करतूतों से, छेद रहे माता का अन्तर। संविधान को धता बताकर, ये मनमाने ढोल बजायें। आओ हिन्दीदिवस मनायें।२। जो जन-जन का राजदुलारा, उसको है इण्डिया बनाया। अपने को इण्डियन बताकर, भारतीयता को बिसराया। खाकर के स्वदेश का राशन, गान विदेशों का ये गायें। आओ हिन्दीदिवस मनायें।३। मत माँगे हिन्दी भाषा में, लोगों को विश्वास दिलाया। लेकिन संसद में जाकर के, गिटर-पिटर का सुर अपनाया। आगामी निर्वाचन में हम, नेताओं को धरा दिखायें। आओ हिन्दीदिवस मनायें।४। -- (२) कदम-कदम पर साथ निभाती। कार हमारी हमको भाती।। हिन्दीदिन पर इसको लाये। हम सब मन में थे हर्षाये।। आज तीसरा जन्मदिवस है। लेकिन अब भी जस की तस है।। यह सफर की सखी-सहेली। अब भी है ये नयी-नवेली।। साफ-सफाई इसकी करते। इसका ध्यान हमेशा धरते।। सड़कों पर चलती मतवाली। कभी न धोखा देने वाली।। सदा सँवारो सबका जीवन। चाहे जड़ हो या हो चेतन।। पूरे घर को तुम हो भायी। जन्मदिवस पर तुम्हें बधायी। |
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