झूलते हैं
शाख़ से
ज़र्द पत्तों की भला
कीमत कहाँ
बस किताबों के लिए
अपना वुजूद
किस लिए
यूँ कांपते उड़ते फिरें
थरथराते-डोलते से
यूँ हवा के देश पर
क्यों निगाहे ज़ीस्त में
घिरते फिरें
एक दिन सूखेंगे और
पतझड़ बनेंगे
पाँव के नीचे कुचल
पिसते रहेंगे
चरमराते तोड़ते ख़ामोशियाँ
पर शिकायत है
शजर से
कल तलक हम से ही था
उसका वुजूद
आज उसकी शाख़-शाख़
हमको हवा देने लगी
कब गिरें हम टूटकर
हरएक पत्थर कह रहा
और हम लाचार पत्ते
बस हवाओं से डरें
देखिए अब ये हवाएँ क्या करें
पर नहीं मिट के भी मिट पाएँगे हम
ये हवा हम को
कहीं ले जाएगी
एक झरना
बह रहा जो प्रीत का
हम उसी की ओर
क्यों न रुख़ करें
मिल के पानी में
उगें फिर फूल बन जाएँ कहीं
और खुशबू बन के फैलें
इस जहाँ में
आओ साथी
हम हवा के संग
तलाशें हम सुख़न
कुछ मचलते से आबशार
