खल रही विदेश को, देश की स्वतन्त्रता। छल रही स्वदेश को, देश की स्वतन्त्रता।। खा रहे हैं देश की, गा रहे विदेश की, खिल्लियाँ उड़ा रहे हैं, भारतीय वेश की, पनप रही है दासता, सिसक रही स्वतन्त्रता। छल रही स्वदेश को, देश की स्वतन्त्रता।। बेड़ियाँ पड़ीं हैं, देवनागरी के पाँव में, बिलख रहे सपूत, आतताइयों के गाँव में, पंगु बन के चल रही है, देश की स्वतन्त्रता। छल रही स्वदेश को, देश की स्वतन्त्रता।। पान भी वही है और, पानदान भी वही, बागडोर जिनके हाथ, खानदान भी वही, फिर है क्यों थकी हुई, स्वदेश की स्वतन्त्रता। छल रही स्वदेश को, देश की स्वतन्त्रता।। |
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मंगलवार, 14 अगस्त 2012
"देश की स्वतन्त्रता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शनिवार, 27 अगस्त 2011
"उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
जिस उपवन में पढ़े-लिखे हों रोजी को लाचार। उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।। जिनके बंगलों के ऊपर, निर्लज्ज ध्वजा लहराती, रैन-दिवस चरणों को जिनके, निर्धन सुता दबाती, जिस आँगन में खुलकर होता सत्ता का व्यापार। उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।। मुस्टण्डों को दूध-मखाने, बालक भूखों मरते, जोशी, मुल्ला, पीर, नजूमी, दौलत से घर भरते, भोग रहे सुख आजादी का, बेईमान मक्कार। उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।। वयोवृद्ध सीधा-सच्चा, हो जहाँ भूख से मरता, सत्तामद में चूर वहाँ हो, शासक काजू चरता, ऐसे निष्ठुर मन्त्री को, क्यों झेल रही सरकार। उस कानन में स्वतन्त्रता का नारा है बेकार।। |
रविवार, 14 अगस्त 2011
"गीत-...बन्दी है आजादी अपनी,." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मेरे पति (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक") ने स्वाधीनता-दिवस पर यह गीत लिखा था। इसे मैं अपनी आवाज में प्रस्तुत कर रही हूँ- श्रीमती अमर भारती |
मेरे प्यारे वतन, ऐ दुलारे वतन।। अपने पावों को रुकने न दूँगा कहीं, मैं तिरंगे को झुकने न दूँगा कहीं, तुझपे कुर्बान कर दूँगा मैं जानो तन। मेरे प्यारे वतन, ऐ दुलारे वतन।। जन्म पाया यहाँ, अन्न खाया यहाँ, सुर सजाया यहाँ, गीत गाया यहाँ, नेक-नीयत से जल से किया आचमन। मेरे प्यारे वतन, ऐ दुलारे वतन।। तेरी गोदी में पल कर बड़ा मैं हुआ, तेरी माटी में चल कर खड़ा मैं हुआ, मैं तो इक फूल हूँ तू है मेरा चमन। मेरे प्यारे वतन, ऐ दुलारे वतन।। स्वप्न स्वाधीनता का सजाये हुए, लाखों बलिदान माता के जाये हुए, कोटि-कोटि हैं उनको हमारे नमन। मेरे प्यारे वतन, ऐ दुलारे वतन।। जश्ने आजादी आती रहे हर बरस, कौम खुशियाँ मनाती रहे हर बरस, देश-दुनिया में हो बस अमन ही अमन। मेरे प्यारे वतन, ऐ दुलारे वतन।। |
और यह दूसरा गीत हमारी वर्तमान स्थिति को बयान कर रहा है! मैला-पंक समाया है, निर्मल नदियों की धारों में।। नीचे से लेकर ऊपर तक, भ्रष्ट-आवरण चढ़ा हुआ, झूठे, बे-ईमानों से है, सत्य-आचरण डरा हुआ, दाल और चीनी भरे पड़े हैं, तहखानों-भण्डारों में। मैला-पंक समाया है, निर्मल नदियों की धारों में।। नेताओं की चीनी मिल हैं, नेता ही व्यापारी हैं, खेतीहर-मजदूरों का, लुटना उनकी लाचारी हैं, डाकू, चोर, लुटेरे बैठे, संसद और सरकारों में। मैला-पंक समाया है, निर्मल नदियों की धारों में।। आजादी पूँजीपतियों को, आजादी सामन्तवाद को, आजादी ऊँची-खटियों को, आजादी आतंकवाद को, निर्धन नारों में बिकता है, गली और बाजारों में। मैला-पंक समाया है, निर्मल नदियों की धारों में।। (चित्र गूगल सर्च से साभार) |
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