मात शारदे को कभी, मत बिसराना मित्र।
मेधावी मेधा करे, उन्नत करे चरित्र।१।
कल तक जो बैरी रहे, आज बन गये मित्र।
अच्छे-अच्छों के यहाँ, बिकते रोज चरित्र।२।
भावनाओं के वेग में, बह मत जाना मित्र।
रखना हर हालात में, अपने साथ चरित्र।३।
अगर आचरण में रहे, उज्जवल चित्र-चरित्र।
प्रतिदिन तन के साथ में, मन को करो पवित्र।४।
नाजुक दौर निकल गया, बदल गये हैं मित्र।
हुआ खेल का अन्त तो, बदल गये हैं चित्र।५।
चरैवेति के मन्त्र को, भूल न जाना मित्र।
लेखक की ही लेखनी, जाहिर करे चरित्र।६।
नित्य नियम से कीजिए, मन को सदा पवित्र।
नहीं पूजना चित्र को, पूजो मात्र चरित्र।७।
अमल-धवल होता नहीं, सबका चित्त-चरित्र।
जाँच-परख के बाद ही, यहाँ बनाना मित्र।८।
नहीं रहा अब आचरण, लोग हुए अपवित्र।
पाश्चात्य परिवेश में, दूषित हुआ चरित्र।९।
दीन-हीन थोथे वचन, कभी न बोलो मित्र।
वाणी से होता प्रकट, अच्छा-बुरा चरित्र।१०।
अगर आचरण शुद्ध हो, उज्जवल रहे चरित्र।
प्रतिदिन तन के साथ में, मन भी रहे पवित्र।११।
सोच-समझकर खोलना, अपनी वाणी मित्र।
जिह्वा देती है बता, अच्छा-बुरा चरित्र।१२।
सबसे पहले जाँचिए, उसका चित्त-चरित्र।
यदि गुण हों अनुकूल तब, उसे बनाओ मित्र।१३।
सौ-सौ बार विचारिए, क्या होता है मित्र।
खूब जाँचिए-परखिए, पहले चित्त-चरित्र।१४।
बिगड़ गया वातावरण, बिगड़ा आज चरित्र।
ऐसे में तो योग ही, तन-मन करे पवित्र।१५।
दर्पण में आता अगर, हमको नज़र चरित्र।
कभी न फिर हम देखते, खुद का उसमें चित्र।१६।
दिल की कोटर में बसा, मन है बड़ा विचित्र।
मन को दर्पण लो बना, कर लो चित्त पवित्र।१७।
आधी घरवाली नहीं, होती साली मित्र।
रखना हरदम चाहिए, अपना साफ चरित्र।१८।
जल का करके आचमन, अन्तस करो पवित्र।
लेकिन पहले कीजिए, अपना साफ चरित्र।१९।
लगा रहे हैं सब यहाँ, अपने मन के चित्र।
अच्छे-अच्छों का हुआ, दूषित यहाँ चरित्र।२०।
व्यथा जगत की है यही, व्यथा-व्यथा है मित्र।
ऐसा ही अब हो गया, युग का चित्र-चरित्र।२१।
साम-दाम-भय-भेद का, दर्शन बड़ा विचित्र।
बहके हुए चरित्र की, पोल खोलते चित्र।२२।
|
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रविवार, 29 मार्च 2020
विविध दोहावली "चरित्र पर बाइस दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शनिवार, 6 जनवरी 2018
विविध दोहावली "हाथों में पिस्तौल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
इनके जैसा है नहीं, जग
में छ्न्दविधान।१।
विषय-वस्तु में सार हो, लेकिन
हो लालित्य।
दुनियाँ को जो दे दिशा, वो ही
है साहित्य।२।
पेड़ नीम का झेलता, पीड़ा
को चुपचाप।
देता शीतल छाँव को, हरता
सबके ताप।३।
त्योहारों में बाँटिए, खुश
होकर आनन्द।
सम्बन्धों में कीजिए, बैर-भाव
को बन्द।४।
मोटी रकम डकार कर, करते
बहस वकील।
गद्दारों के पक्ष में, देते
तर्क दलील।५।
बालक रखते हो जहाँ, हाथों
में पिस्तौल।
उस जन्नत की धरा का, बिगड़
गया माहौल।६।
सदमा सैनिक झेलते, सीमा
पर दिन-रात।
लेकिन शासक कर रहे, चिकनी-चुपड़ी
बात।७।
समय बीतता जा रहा, और
करो मत देर।
जन-मानस अब चाहता, करो
पाक को ढेर।८।
अपने भारत देश में, हो
समान कानून।
माटी में खिलने लगें, महके
हुए प्रसून।९।
उपजाता जो अन्न को, वह है
कृषक महान।
नमन जवानों को करे, पूरा
हिन्दुस्तान।१०।
जनता की है दुर्दशा, जन-जीवन
बेहाल।
कूड़ा-कर्कट बीनते, भारत
माँ के लाल।११।
आड़ी-तिरछी हाथ में, सबके
बनीं लकीर।
कोई है राजा यहाँ, कोई रंक-फकीर।१२।
बिगड़ गया है आज तो, दुनिया
का परिधान।
मानवता का हो रहा, पग-पग
पर अपमान।१३।
वृक्ष बचाते हैं धर,देते
सुखद समीर।
लहराते जब पेड़ हैं, घन
बरसाते नीर।१४।
मक्कारों ने हर लिया, जनता
का आराम।
बगुलों ने टोपी लगा, जीना
किया हराम।१५।
नौका लहरों में फँसी, बेबस
खेवनहार।
ऐसा नाविक चाहिए, जो ले
जाये पार।१६।
अंगारा सेमल हुआ, वन
में खिला पलाश।
मन के उपवन में उठी, भीनी
मन्द-सुवास।१७।
|
गुरुवार, 13 अप्रैल 2017
दोहे "विविध दोहावली" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
केवल
मन में था बसा, धन का जिनके भाव।
डूब
गयी मझधार में, उनकी छल की नाव।।
--
देखा
मद में चूर हैं, अपने जहाँपनाह।
तब
चल पड़े वजीर सब, पकड़ दूसरी राह।।
--
सोचा
आम चुनाव में, पा जाऊँगा वोट।
हार
गये दोनों जगह, नीयत में था खोट।।
--
इतना
भोला भी नहीं, प्रान्त उत्तराखण्ड।
हरदा
के अभिमान का, तोड़ा सभी घमण्ड।।
--
सीधे-सादे
हों भले, लेकिन चतुर सुजान।
लोग
उत्तराखण्ड के, रखते हैं ईमान।।
--
सीना
है जिनका बना, फौलादी चट्टान।
चिकनी-चुपड़ी
बात को, जाते हैं पहचान।।
--
सीमाओं
की कर रहे, निगरानी जी तोड़।
भारत
माँ के शत्रु की, देते गरदन तोड़।।
--
कभी
पहल करते नहीं, करने में जो वार।
ऐसे
ही जाँबाज हैं, अपने पहरेदार।।
--
जिनके
दम पर देश की, बची हुई है आन।
सब
करते शान से, पूजा और अजान।।
--
उपजाता
जो अन्न को, वह है कृषक महान।
नमन
जवानों को करे, पूरा हिन्दुस्तान।।
|
बुधवार, 15 फ़रवरी 2017
विविध दोहावली "भारत माँ के लाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
निहित ज्ञान का पुंज है, गीता में श्रीमान।
पढ़ना इसको ध्यान से, इसमें है विज्ञान।।
जनता की है दुर्दशा, जन-जीवन बेहाल।
कूड़ा-कर्कट बीनते, भारत माँ के लाल।।
मामा शकुनि हो गये, बिगड़ गये हैं ढंग।
पक्षपात को देखकर, हुए भानजे दंग।।
देते हैं सन्ताप को, नीच घरों के लोग।
इसीलिए तो मुकदमें, लोग रहे हैं भोग।।
चना-चबेना भी नहीं, महँगाई की मार।
अब तो इस सरकार से, गया आदमी हार।।
आड़ी-तिरछी हाथ में, होतीं बहुत लकीर।
कोई है राजा यहाँ, कोई रंक-फकीर।।
सुख देती है सभी को, जल की नेह फुहार।
वासन्ती परिवेश में, कुदरत का उपहार।।
पाषाणों की चोट से, शीशा जाता टूट।
मनुज कभी झुकता नहीं, पीकर गम के घूँट।।
हर युग में होती रही, अभिमन्यू की मौत।
खुली चुनौती दे रहा, चन्दा को खद्योत।।
शिकवा और शिकायतें, जीवन के हैं साथ।
बुरे वक्त में दोस्त को, आजमाइए तात।।
हँसकर जीवन को जियो, रहना नहीं उदास।
नीरसता को त्याग कर, करो हास-परिहास।।
प्रणय जगाता है सदा, तन-मन में उदगार।
प्रेम हमेशा ही रहा, जीवन का आधार।।
नौनिहाल को सीख दें, सुधरेगा संसार।
कहने से पहले जरा, मन में करो विचार।।
चिपकी-चिपकी पेंट से, नंगी देह दिखाय।
अच्छा-खासा आदमी, नंगा सा बन जाय।।
नंगापन फैशन बना, इससे रहना दूर।
पूरब वाले क्यों हुए, फैशन में मजबूर।।
बिगड़ गया है आज तो, दुनिया का परिधान।
मानवता का हो रहा, पग-पग पर अपमान।।
|
रविवार, 26 जून 2016
"विविध दोहावली-अपना भारत देश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
बारिश और गुलाब का, सुन्दर है संयोग।
वर्षा के आनन्द को, लोग रहे हैं भोग।१।
--
कुरीतियों के जाल में, जकड़े लोग तमाम।
खोलो ज्ञानकपाट को, जिससे बनते काम।२।
--
हर घर में बैठे हुए, कितने नीम-हकीम।
जहर घोलते जगत में, बनकर मीठे नीम।३।
--
परिवर्तन ही ज़िन्दगी, आयेंगे बदलाव।
अनुभव के पश्चात ही, आता है ठहराव।४।
--
योगिराज के नाम का, सब करते गुणगान।
कलियुग में फिर आइए, श्री कृष्ण भगवान।५।
--
सहने को सन्ताप को, जनता है मजबूर।
महँगाई ने कर दिया, सबको सुख से दूर।६।
--
नुक्कड़ की हर गली में, पत्रकार की धूम।
उल्लू सीधा कर रहे, चरण-धूलि को चूम।७।
--
चल मनवा उस देश में, जहाँ नहीं हों काम।
चैन-अमन के साथ में, मन पाये विश्राम।८।
--
खास आदमी पूछता, आम आदमी कौन।
खास-खास-को पूछते, आम हो गया गौण।९।
--
खाम-खयाली में नहीं, रहना यहाँ ज़नाब।
काम बिना कोई यहाँ, बनता नहीं नवाब।१०।
--
मधु के लालच में कभी, मिल जाता आघात।
दुनिया में मनुहार से, बनती बिगड़ी बात।११।
--
भिन्न-भिन्न हैं मान्यता, मिन्न-भिन्न परिवेश।
गुलदस्ता सा लग रहा, अपना भारत देश।१२।
--
माँ सबको प्यारी लगे, ममता का पर्याय।
माँ के शुभ-आशीष से, सब सम्भव हो जाय।१३।
--
चाँद चमकती है तभी, जब यौवन ढल जाय।
पीले पत्तों में नहीं, हरियाली आ पाय।१४।
--
सहता है अपमान को, धरती का भगवान।
फिर भी अन्न उगा रहा, सबके लिए किसान।१५।
--
जिस घर में मिलता सदा, नारी को सम्मान।
वो घर मन्दिर सा लगे, मानो स्वर्ग समान।१६।
--
भोलीचिड़िया बाज को, समझ रहीं है मीत।
रक्षक ही भक्षक बनें, कैसी है ये रीत।१७।
--
चपला चमके व्योम में, बादल करते शोर।
रिमझिम पानी बरसता, मन में उठे हिलोर।१८।
--
नेताओं की बात पर, करना मत विश्वास।
वाह-वाही के वास्ते, चमचे सबके पास।१९।
--
जो चमचे फौलाद के, वो हैं धवल सफेद।
उनकी तो हर बात में, भरे हुए हैं भेद।२०।
--
अच्छी सूरत
देखकर, मत
होना अनुरक्त।
जग के मायाजाल से, मन को करो विरक्त।२१। |
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