रचना बिन अस्तित्व अधूरा लगता है।। प्रेम-रोग में गम का होना, जीवन का ये ही है रोना, प्रियतम बिन अपनत्व अधूरा लगता है। करुणा बिन करुणत्व अधूरा लगता है।। नालों का जहरीला पानी, लील रहा मासूम जवानी, जीवन बिन दायित्व अधूरा लगता है। करुणा बिन करुणत्व अधूरा लगता है।। बचपन बहुत सुहाना लगता, सुख का ठौर ठिकाना लगता, भाई बिन भ्रातृत्व अधूरा लगता है। करुणा बिन करुणत्व अधूरा लगता है।। माँ होती ममता की मूरत, सबसे प्यारी उसकी सूरत, ममता बिन मातृत्व अधूरा लगता है। करुणा बिन करुणत्व अधूरा लगता है।। |
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सोमवार, 9 जुलाई 2012
"अस्तित्व अधूरा लगता है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शुक्रवार, 5 अगस्त 2011
"जंगली होते...." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
घर और परिवार बन्धु-बान्धव और रिश्तेदार आदर और सत्कार सभी कुछ तो है लेकिन कभी-कभी आभास होता है कि कुछ खालीपन है और यहाँ भी स्वार्थ का ही अपनापन है -- जालजगत पर कदम बढ़ाया तो यहाँ भी साहित्य-सरोवर नज़र आया किन्तु यह आभासी संसार है सिर्फ दूर-दूर का ही प्यार है लिखो तो वाह-वाही और आभार है न लिखो तो कोई पूछने वाला भी नहीं है जिन्दा हो या सिघार गये हो! जीत गये हो या हार गए हो! -- यह सब देख कर मन ऊब गया है और गहरी सोच में डूब गया है -- जब मैं गया पहाड़ों में, खेतों में जंगल में-उपवन में तब... चैन और सुकून मिला इस वैरागी मन में -- यहाँ कोई स्वार्थ नहीं है कोई बैर-भाव नहीं है सहज मुस्कान है यहाँ आकर तो मिट गई सारी थकान है -- काश् हम भी सुमन होते झाड़ी के होते या बगीचे के होते क्या फर्क पड़ता? इन्सानों की बस्ती के होते या जंगली होते.... लेकिन होते तो... खुशियाँ बाँटने वाले फूल ही.........! |
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